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लिखना बुरी बला है

यह बात लोग मानते नहीं लेकिन निरक्षरता के अपने फायदे हैं। साक्षरता बहुत बुरी चीज है और साक्षरता का इस्तेमाल पढ़ने-लिखने के लिए करना तो खतरनाक है। नहीं यकीन होता तो जसवंत सिंह को देखिए। किताब लिखी और पार्टी से बाहर हुए। अगर वे पढ़ने-लिखने काखतरनाक शौक न पालते तो पार्टी में बने रहते। गौर करने की बात यह भी है कि जिन लोगों ने उन्हें पार्टी से निकाला, उन्होंने कभी किताब नहीं लिखी। लोग कह सकते हैं कि आडवाणी भी उस बैठक में थे, जिसमें जसवंत सिंह को निकालने का फैसला किया गया और आडवाणी ने भी शायद एकाध किताब लिखी है और कुछ लोग तो यहां तक कहते हैं कि उन्होंने कुछ किताबें पढ़ी भी हैं। पर जसवंत सिंह को निकालने वाले फैसले में आडवाणी की कितनी चली। वैसे आडवाणी की ही हालत जसवंत सिंह से कौन सी बेहतर है। इस देश में कई राजनेता हुए हैं, जो बहुत सफल रहे हैं और अनपढ़ थे। आपको ऐसा उदाहरण ढूंढे से नहीं मिलेगा कि किसी नेता को अनपढ़ होने के लिए पार्टी से निकाल दिया गया। अनपढ़ रह कर उसने एक खतरे से तो निजात पा ली, उसे कोई कभी पार्टी से किताब लिखने के लिए नहीं निकालेगा। पढ़ना भी लिखने से कम खतरनाक नहीं है, कई बार लोगों को पढ़ने के लिए जेल जाना पड़ा है। हमारे प्रगतिशील मित्र बता सकते हैं कि पुराने कम्युनिस्ट शासनों के दौरान कैसे कैसे साहित्य को पढ़ने के लिए लोग जेल गए हैं। हमारे यहां भी इमरजेंसी में कई लोग इसलिए जेल गए हैं कि उनके यहां जब्तशुदा किताबें या पर्चे बरामद हुए। फिलहाल तो आप गुजरात में जसवंत सिंह की किताब पढ़ने के लिए भी जेल जा सकते हैं। इसलिए पुराने समझदार लोग ठीक कहते थे कि पढ़ने लिखने से कोई फायदा नहीं। जो वक्त किताबों में सिर गड़ाने में जाया होता है, उस वक्त बाहर खुली हवा में निकलें तो ताजी हवा मिलेगी। अगर उस वक्त शोहदेगिरी या राजनीति की प्रैक्टिस कर लें तो भविष्य भी उज्जवल
हो सकता है। अब क्या नहीं था जसवंत सिंह के पास। केन्द्र में मंत्री बन गए, लोकसभा चुनाव तक जीत गए, इसके बाद किताब लिखने की क्या सूझी? लिखनी थी तो राष्ट्रभक्ति की कविताओं की लिखते, या संसद में अपने दिए भाषणों को छपवाते। कोई भी पढ़ता नहीं और ‘वाह-वाह’ करता। ऐसी किताब लिख मारी, जिसे न पढ़ने वालों ने खतरनाक माना और पार्टी से निकाल दिया। जब भी संघर्ष पढ़ने-लिखने वालों और न पढ़ने-लिखने वालों में होगा, तब न पढ़ने-लिखने वाले ही जीतेंगे। इसलिए यह मान लीजिए कि सबको पढ़ाने का सरकार का दावा एक षड्यंत्र है, जनता के खिलाफ।

 

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