DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

भाजपा नेतृत्व में अंतर्कलह, मायूस हो रहे जमीनी कार्यकर्ता

भाजपा-पार्टी विद द डिफरेंस अभी अंतर्कलह की आग से तप रही है। विचार और सिद्धांत की बुनियाद पर बनी देश की दूसरी सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी इन दिनों शायद अपने सबसे बुरे दिनों से गुजर रही है। सबसे सशक्त विपक्ष की भूमिका निभाने की बजाय अंतद्र्वंद्व से यह उबर नहीं पा रही है। लड़ ऊपर के नेता रहे हैं, लेकिन इसका असर नीचे कार्यकर्ताओं पर पड़ रहा है।

खासकर वैसे समर्पित कार्यकर्ता जो पिछले तीस-पैंतीस बरसों से पार्टी से जुड़े हैं। उन्हें लग रहा है, यह सब अच्छा नहीं हो रहा है। संघ, विद्यार्थी परिषद और जनसंघ से होते हुए आज भाजपा का झंडा ढो रहे हैं, ऐसे कार्यकर्ता सौ, पांच सौ नहीं, हजारों में हैं। वैचारिक और सैद्धांतिक रूप से एकदम प्रतिबद्ध। पार्टी से इन्हें कुछ मिले न मिले, ये सदैव पार्टी से ही जुड़े रहेंगे।

झारखंड के ऐसे कुछ पुराने कार्यकर्ताओं से हिन्दुस्तान ने भाजपा की वर्तमान दशा-दिशा पर प्रतिक्रिया जाननी चाही। उनकी संक्षिप्त टिप्पणियां पार्टी के हालात पर उनकी मन की व्यथा को कुछ यूं प्रतिबिंबित करती हैं-

भाजपा किसान मोर्चा के प्रदेश अध्यक्ष ओम सिंह- शीर्ष नेताओं के बीच वैचारिक मतभेद दल के अंदर लोकतंत्र की आस्था को प्रदर्शित करता है। लेकिन निचले स्तर के कार्यकर्ताओं के मानस पर इसका प्रतिकूल असर पड़ता है।
भाजपा के पूर्व प्रदेश प्रवक्ता उमाशंकर केडिया - इसक असर अच्छा नहीं पड़ रहा है।

भाजपा के कार्यकर्ता और समर्थक ऐसा देख-सुन मायूस होते हैं। वे कभी नहीं चाहेंगे कि परिवार में ऐसा माहौल बने। प्रदेश उपाध्यक्ष मधुराम साहु- ऊपरवालों की बात क्या की जाए। हम छोटे कार्यकर्ता हैं। लेकिन इससे थोड़ी मायूसी तो होती है। मां-बाप लड़ते हैं तो बच्चों पर कैसे नहीं असर पड़ेगा।

पूर्व प्रदेश प्रवक्ता सह कार्यकारिणी सदस्य प्रेम कटारूका- शीर्ष नेतृत्व में चल रहे वैचारिक द्वंद्व को देखकर पार्टी के सामान्य कार्यकर्ता हताश हैं। यह पार्टी की सेहत के लिए अच्छी बात नहीं कही जा सकती है।

रांची के विधायक चंद्रेश्वर प्रसाद सिंह- दल के ऊपरी नेताओं के बीच जो कुछ हो रहा है उससे पार्टी के जमीनी कार्यकर्ता निराश हैं। इतना ही नहीं, राह चलते पार्टी के शुभचिंतक और समर्थक भी यह सब देखकर अच्छी प्रतिक्रिया नहीं व्यक्त कर रहे हैं। जो कुछ हो रहा है, अच्छा नहीं है।

पूर्व प्रदेश अध्यक्ष सह पूर्व सांसद दुखा भगत: बड़े नेताओं के बीच जो कुछ चल रहा है, उस पर हम छोटे कार्यकर्ता क्या कह सकते हैं। लेकिन इससे हम निराश और हताश जरूर हैं। आनेवाले दिनों में बेहतर की उम्मीद की जा सकती है।

प्रदेश कार्यसमिति के सदस्य सूर्यमणि सिंह- भाजपा के केंद्रीय नेताओं में वैचारिक मतभेद तो देखने को मिला है। लेकिन मतभेद की वजह से ऊपर के नेताओं पर कोई असर पड़े ना पड़े, निचले स्तर के कार्यकर्ताओं पर पड़ता ही है। इससे मायूसी होती है।

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:भाजपा नेतृत्व में अंतर्कलह