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दलितों के लिए स्थापित स्कूल है उपेक्षा का शिकार

उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद में दलित और उपेक्षित तबके के बच्चों के लिए स्थापित एक स्कूल उपेक्षा का शिकार बना हुआ है। इस संस्था में पढ़े बच्चे भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी भी बने हैं। इस स्कूल की उपेक्षा और दुर्दशा से यहां के शिक्षा क्षेत्र से जुड़े लोग एवं सामाजिक संगठन हतप्रभ हैं। प्रयागघाट रेलवे स्टेशन के निकट स्थित विकास विद्यालय आश्रम नामक यह स्कूल वर्ष 1959 में एक ट्रस्ट द्वारा स्थापित किया गया था और वर्ष 1996 में सरकार ने इस अपने अधीन ले लिया था। आश्रम पद्धति पर स्थापित यह स्कूल राज्य के समाज कल्याण विभाग के अधीन है।

कर्मचारियों एवं पर्याप्त धन के अभाव में यह स्कूल बुरी तरह से पिछड़े पासी, कन्जड़, हबूडा आदि जातियों के बच्चों को शिक्षा देने का अपना उद्देश्य पूरा नहीं कर पा रहा है। स्कूल के प्रबन्धक बीबी जोशी के अनुसार दरअसल इस स्कूल का मकसद ऐसे अशिक्षित लोगों के बच्चों को शिक्षित करना था जो अपने बच्चों की देखरेख न कर आपराधिक गतिविधियों में लिप्त थे। जोशी ने बातचीत में कहा कि धन के अभाव में स्कूल में अपेक्षा से बहुत कम सुविधाएं हैं और स्वीकृत 42 पदों के सापेक्ष यहां सिर्फ 19 कर्मचारी हैं। इस स्कूल के छात्रवास की हालत बहुत दयनीय है और 170 छात्रों वाले छात्रवास में कोई रसोइया नहीं होने के कारण छात्रों को अपना खाना खुद बनाना पड़ता है।

जोशी ने स्वीकार किया कि स्कूल का भवन बहुत जीर्णशीर्ण दशा में है जबकि इसका गौरवशाली अतीत रहा है और इसमें पढ़े बच्चे पीसीएस से लेकर आईएएस तक बने हैं। जिलाधिकारी इस स्कूल के अध्यक्ष होते हैं और उनसे कई बार रिक्त पदों को भरने के लिए कहा गया लेकिन कुछ नहीं हुआ। सम्पर्क किए जाने पर जिलाधिकारी राजीव अग्रवाल ने बताया कि यह स्कूल एक निजी संस्था द्वारा चलाया जा रहा था। कुछ साल पहले राज्य सरकार ने इसे अपने नियंत्रण में ले लिया था।
 
उन्होंने बताया कि इसके बाद प्रबन्ध तंत्र ने एक याचिका दाखिल कर स्थगनादेश पा लिया, जो शायद अभी भी प्रभावी है। इस नाते वह कोई कदम नहीं उठा पा रहे हैं। जोशी ने स्कूल को लेकर किसी विवाद से इन्कार किया। उन्होंने कहा कि वर्ष 2007 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने अपने आदेश में माना था कि यह उत्तर प्रदेश इण्टरमीडिएट शिक्षा अधिनियम1921 के तहत मान्यता प्राप्त है।

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