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लगातार बढ़ रहे हैं स्वाइन फ्लू के संदिग्ध मरीज

पर्यावरण की दृष्टि से अन्य राज्यों की तुलना मे स्वच्छ माने जाने वाले पर्वतीय राज्य उत्तराखंड मे स्वाइन फ्लू के संदिग्ध मरीजों की संख्या में लगातार इजाफा हो रहा है और अब तक इस बीमारी के 300 से भी अधिक संदिग्ध मरीजों का इलाज किया जा चुका है जबकि 120 लोगों के रक्त तथा थूक के नमूने जांच के लिये दिल्ली भेजे जा चुके हैं ।

उत्तराखंड में स्वाइन फ्लू के नोडल अधिकारी डा पंकज जैन ने बताया हालांकि उत्तराखंड मे अभी तक राज्य का अपना कोई भी मरीज
सामने नहीं आया है जो भी संदिग्ध मरीज आये हैं वे सभी अन्य राज्यों से आये हुये मरीज ही हैं और उन संदिग्ध मरीजों का इलाज पूरी तत्परता से किया जा रहा है ।

राज्य मे अब केन्द्र के नये दिशा निर्देश के तहत उन्हीं लोगों के रक्त और थूक के नमूने लिये जा रहे हैं जिनके अंदर स्वाइन फ्लू के प्रारंभिक लक्षण दिखाई दे रहे हैं क्योंकि दिल्ली में पूरे देश से हजारों की संख्या मे नमूने जांच के लिये भेजे जा रहे हैं जिससे वहां बडी भीड़ हो गयी है और जल्दी रिपोर्ट भी तैयार नहीं हो पा रही है ।

उन्होंने कहा कि अब जो भी संदिग्ध मामले सामने आ रहे हैं उनका इलाज शुरू कर दिया ज रहा है ।

डा जैन ने बताया कि विभिन्न जिलों के डाक्टरों को स्पष्ट निर्देश दिया गया है कि जैसे ही स्वाइन फ्लू के जरा सा भी लक्षण दिखाई दें तुरंत रोगी को स्वाइन फ्लू की दवा देनी शुरू कर दी जाये । खास तौर पर पांच वर्ष से कम बच्चों, 65 वर्ष से ज्यादा के बुढ़ों और गर्भवती महिलाओं के बारे मे तो किसी प्रकार का जोखिम नहीं लेने का निर्देश जारी किया गया है ।

उन्होंने बताया कि राज्य में स्वाइन फ्लू से अभी तक एक ही संदिग्ध व्यक्ति की मौत हुई है और 17 व्यक्तियों के नमूने जांच के लिये दिल्ली भेजे जा चुके हैं । डा जैन ने बताया कि सभी संदिग्ध मरीजों का कम से कम पांच दिन का इलाज जरूर किया जाता है ताकि संभावित लक्षणों को पूरी तरह से समाप्त किया जा सके ।

उन्होने बताया कि स्वास्थ्य विभाग ने इस बीमारी के खिलाफ अपने डाक्टरों को और अधिक सचेत करते हुये उन्हें विशेष प्रशिक्षण दिया है । अगस्त महीने में अभी तक एक भी स्वाइन फ्लू का मामला सामने नहीं आया है । उन्होंने कहा कि गत जुलाई महीने में चार मामले पाये गये थे लेकिन उनका तत्परता से इलाज किया गया और सभी ठीक हो गये थे । किसी भी मरीज के अन्दर स्वाइन फ्लू के थोडे भी लक्षण पाये जाने पर उसे दवा देनी शुरू कर दी जाती है और जब उसकी रिपोर्ट नकारात्मक आती है तो दवा बंद कर दी जाती है ।

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