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पारदर्शिता से कांपती व्यवस्था

नेता हो या नौकरशाह उन्हें जनता के प्रति जवाबदेह और जिम्मेदार बनाए रखने के लिए यह जरूरी है कि यह बात जगजाहिर हो कि वह क्या कर रहे हैं और कैसे कर रहे हैं? भ्रष्टाचार की जड़, गोपनीयता अर्थात पारदर्शिता के अभाव में ही पनपती है। औपनिवेशिक शासनकाल से ही नहीं, बल्कि उसके पहले सामंती दौर से ही आम आदमी के जीवन को अनावश्यक प्रशासकीय गोपनीयता दूभर बनाती रही है। जो लोग शासक वर्ग से जुड़े होते हैं उनका न्यस्त स्वार्थ सरकार के तिलिस्म को बरकरार रखने में ही होता है। हर छोटे-बड़े काम के लिए जो जानकारी या सूचना बेहद जरूरी होती है, उसे जरूरतमंद की पहुंच से बाहर रखकर ही भुनाया जा सकता है।

गांव के स्तर पर जमीन-जायदाद से जुड़े पटवारी पेशकार के बस्ते में बंद खसरा-खतौनी या फिर अरबों रुपए वाले रक्षा सौदों के टेंडरों के बारे में प्रतियोगियों की हरकतें इन सभी पर यह बात लागू होती है। इसी कारण जब सूचना के अधिकार वाले कानून को पास किया गया तो अब तक असमर्थ और वंचित करोड़ों भारतीयों को ऐसा लगा कि वास्तव में अब उनकी आजादी सार्थक हुई है। दुर्भाग्यवश ताकतवर और भ्रष्ट नेताओं अधिकारियों की कोशिश यही रही है कि इस कानून को  किसी तरह बधिया बनाया जा सके।

सुर्खियों में जो खबरे हैं, उनमें प्रमुख उच्चतर न्यायपालिका से जुड़ी- माननीय न्यायधीशों की संपत्ति के सार्वजनिक प्रकाशन से जुड़ी है। निर्वाचन आयोग के प्रयासों से जनता के निर्वाचित प्रतिनिधियों के लिए चुनाव लड़ने के पहले अपनी संपत्ति का ब्यौरा सार्वजनिक बनाना अनिवार्य बन गया है। मतदाता बूथ में घुसने के पहले यह जान चुका होता है कि किस उम्मीदवार की हैसियत क्या है और इसके साथ ही यह जानकारी भी जुटाने की कोशिश कर सकता है कि किसकी आय के स्रोत क्या हैं? यह बात छिपी नहीं रह सकती कि जनता की सेवा के लिए राजनीति में प्रवेश करने वाले ‘रंक’ कितनी जल्दी अगले चुनाव तक ‘राजा’ वाली श्रेणी में पहुंच जाते हैं।

आज अधिकांश सांसद और विधायक लखपति नहीं, करोड़पति नज़र आते हैं। बहरहाल, विधायिका से जुड़े लोगों का जीवन वैसे भी ‘खुली किताब’ के पन्नों जैसा होता है, अत: यह उम्मीद करना कि सार्वजनिक जीवन में महत्वपूर्ण सभी व्यक्ित इसी तराजू पर तौले जाने चाहिए, व्यर्थ हैं। इसका यह अर्थ नहीं कि निर्भय और निष्पक्ष समङो जाने वाले न्यायमूर्ति जिनकी स्वाधीनता पर ही हमारे जनतंत्र की नींव टिकी है, पारदर्शिता के परे रह कर ही अपनी जिम्मेदारी निभा सकते हैं। यह सच है कि कुछ लोग न्यायाधीशों पर नाजयज दवाब डालने के लिए उन्हें नाहक परेशान करने के लिए उनके जीवन से जुड़ी जानकारियों का दुरुपयोग कर सकते हैं, पर सिर्फ इस आधार पर यह दलील तर्कसंगत नहीं कि न्यायाधीशों की संपत्ति पर गहरे कुहासे की धुंध ही छाई रहनी चाहिए।

खासकर उस स्थिति में, जब स्वयं यह न्यायाधीश आमदनी के ज्ञात स्रोतों से अधिक संपत्ति वाले अभियुक्तों के मामले में फैसले सुनाते हैं, वह राजनेता हो या नौकरशाह। इस बात को भी अनदेखा नहीं किया जा सकता कि हाल के दिनों में उच्चतर न्यायपालिका के सदस्य भी इस तरह के आरोपों से मुक्त नहीं रहे हैं। इसे दुर्भाग्य ही समझ जा सकता है कि सर्वोच्च न्यायालय में पीठासीन न्यायमूर्ति भी अपनी पूर्णत: विरक्त-तटस्थ छवि की रक्षा करने में असमर्थ रहे हैं। न्यायपालिका की अवमानना के पौराणिक-औपनिवेशिक कवच का उपयोग कर ही वह अपने को निरापद रख सके हैं।

विधि आयोग हो या कानून मंत्रालय, मीडिया में मुखर सजग सतर्क नागरिक हो या स्वयं न्यायपालिका के साथ जुड़े वरिष्ठ विधिवेत्ता और पूर्व मुख्य न्यायाधीश, इस मामले में सभी सहमत हैं कि इस विषय में कानून और परंपरा दोनों में ही तत्काल बदलाव लाने की जरूरत है। फली नरीमन जैसे संयमी जानकार और सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश जस्टिस वर्मा इसी कारण बोलने को विवश हुए हैं। यह बात भी कई बार दोहराई जा चुकी है कि ये सब बातें न्यायपालिका के स्वविवेक पर ही छोड़ दी जानी चाहिए।

दुर्भाग्य से पिछले कई वर्षो का अनुभव यही सबक सिखलाता है कि अपने आचरण को आदर्श-अनुशासित रखने के संदर्भ में अंतरात्मा की आवाज हमेशा कमज़ोर ही साबित हुई है। न्यायपालिका का प्रयत्न यह भी रहा है कि अपने क्रियाकलाप को सूचना के अधिकार के दायरे से बाहर रखे, पर यह बात साफ है कि जनतंत्र में दोहरे मानदंड नहीं हो सकते। सभी संवैधानिक संस्थाओं और अधिकारियों को कानून के राज के अधीन ही समझ जाना चाहिए और नागरिक के मन में इस संबंध में जरा भी शक की गुंजाइश नहीं होनी चाहिए कि ऐसा नहीं हो रहा है।

ऐसा ही एक और उदाहरण संसद की कार्यवाही के दूरदर्शन पर सीधे प्रसारण वाला है। यह सुनने को मिल रहा है कि सदन में मान्य सांसदों के उच्श्रृंख्ल आचरण को देखते हुए माननीय अध्यक्ष महोदया यह फैसला लेने की सोच रही है कि हुड़दंग शुरू होते ही प्रसारण रोक दिया जाए। तर्क यह है कि शोरगुल मचाकर पर्दे पर अपनी सूरत दिखाने को उतावले जनप्रतिनिधि ऐसा आचरण करते हैं। हमारी समझ में यदि कोई ऐसा करता है तो उसे तत्काल दंडित, अनुशासित करने में अध्यक्ष समर्थ है। निलंबन से लेकर निष्कासन तक कुछ भी उनकी पहुंच में है। जब से संसद की कार्यवाही का सीधा प्रसारण होने लगा है, नागरिक अपनी आंखों से यह देख सकता है कि जिन्हें उसने दिल्ली भेजा है, वह क्या कर रहे हैं? सदन की खाली बेंचें हंसी-मजाक वाली नूराकुश्ती और समय का अपव्यय, कथनी और करनी का अंतर किसी से भी छुपा नहीं रह सकता। क्या सीधा प्रसारण रोककर इस तरह का अशोभनीय और गै़रजिम्मेदार आचरण समाप्त हो जाएगा?

हमारे सार्वजनिक जीवन में अधिकांश लोगों के लिए पर्दा बचा ही नहीं है। उनका हाल तो ‘खुल गई लोई तो क्या करेगा कोई’ वाला है। चोटी पर बैठे आला अफसर हों या मंत्री वगैरह आयकर या सीबीआई के छापे एकाध दिन की ही परेशानी का सबब होते है ं। अपने बचाव में हर कोई कहता है कि उसे विपक्षियों ने फंसाया है। पुलिस की जांच हो या न्यायिक जांच आयोग की इन पर भी गोपनीयता का पर्दा पड़ा रहता है। और सब तो छोड़िए, अभिलेखागार में धूल सनी फाइलों में बंद सदियों पुराने सरकारी रहस्य भी बड़ी हिफाजत से संभालकर रखे जाते हैं इस बात से बेखबर कि दुनिया के दूसरे देश हमारे इन संवेदनशील रहस्यों का पर्दाफाश वर्षो पहले कर चुके हैं।

pushpeshpant@ gmail. com

लेखक जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में प्राध्यापक हैं

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