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सतत खोज

कर्म करने से किसी वस्तु की प्राप्ति होती है, किन्तु यह सांसारिक प्राप्ति है। परमात्मा प्राप्ति कर्म साधन का फल नही है, क्योंकि नाशवान कर्मो द्वारा अविनाशी परमात्मा की प्राप्ति हो ही नहीं सकती। अविनाशी परमात्मा की प्राप्ति केवल कर्मो से संबंध विच्छेद होने पर ही हो सकती है। यह कर्मो से संबंध विच्छेद हो कैसे? कर्म न करे तो संबंध नहीं होगा। लेकिन त्रिगुणात्मक स्वभाव तो कर्म करवाते ही हैं। फिर कर्मो से संबंध विच्छेद का सुन्दर उपाय गीता में बताया गया है।

सम्पूर्ण कर्मो को निष्काम भाव से करना कर्मो का प्रवाह संसार की ओर मोड़ देता है, अपनी ओर मोड़ देता है। अपनी ओर यह प्रवाह होता ही नहीं। हमारा संबंध कर्म करते हुए भी उससे नहीं रह जाता। ऐसा केवल निष्काम कर्म करने पर ही हो सकता है। यही सेवा बन जाती है। संसार से, कर्मो से, कर्मफल से जब हमारा यह संबंध नहीं रहता, तभी परमात्मा से नित्ययोग का अनुभव होने लगता है। परमेश्वर से जो हमारा शाश्वत संबंध बहुत पीछे छूटने लगता है। तब जीव जान पाता है कि मेरा नित्य संबंध है ही उस परम के साथ, लेकिन आज तक संसार के काले कम्बल ने इसे छुपा कर रखा हुआ था।

मैं संसार से ही अपने संबंध को सत्य समझ बैठा था। यह संबंध तो केवल मेरा माना हुआ था। वास्तव में है ही नहीं। कर्तव्य का अभाव ही कर्मो की दिव्यता है। दृष्टि का बदल जाना ही कर्मयोग है, जब हम इस संसार को भगवान की लीला समझें तो फिर यह संसार रहते हुए भी नहीं रहेगा, केवल भगवान रह जाएंगे। तभी चारों ओर भगवद् दर्शन होगा।

संसार स्वयं जड़ प्रकृति का है, इसलिए दूसरा संबंध जोड़ लेने पर जीव में भी जड़ता उत्पन्न हो जाती है और कर्म मलिन होकर बन्धन कारक हो जाते हैं। यही जड़ता परमात्मा के अनुभव में बाधक है। कर्तव्य भावना से किए गए कर्म, कभी पाप कर्म नहीं बनते, अत: अपनी वृत्तियों पर अपना अंकुश लगाना ही श्रेयकर है।

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