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28 फरवरी, 2020|6:12|IST

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कटी पतंग की डोर

भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व के लिए मुश्किलें बढ़ती ही जा रही हैं। जसवंत सिंह ने तो पार्टी से निकाले जाने पर नेतृत्व पर बमबारी की थी, लेकिन अरुण शौरी ने तो पार्टी में रहते हुए नेतृत्व को जिन शब्दों से नवाज है, उन्हें बर्दाश्त करना आसान नहीं है। अरुण शौरी के आक्रमण की रणनीति भी ऐसी है, जिससे निपटना आसान नहीं है। उन्होंने जसवंत सिंह को निकाले जाने की तो आलोचना की है, साथ ही साथ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से भी आग्रह किया है कि वह भाजपा के मौजूदा नेतृत्व को भंग करके नया नेतृत्व स्थापित करे।

भाजपा में अब तक यह माना जाता था कि दो पक्ष हैं पहला, अपेक्षाकृत अनुदार आरएसएस का नियंत्रण चाहने वाला पक्ष और दूसरा अपेक्षाकृत उदार, आधुनिक तबका। भाजपा की सारी लड़ाइयों को इन दो पक्षों के संघर्ष के रूप में देखा जाता था। शौरी ने यह सुविधाजनक समीकरण उलट दिया है, वे एक ओर जसवंत सिंह के पक्ष में भी खड़े हैं और दूसरी ओर संघ का ज्यादा नियंत्रण चाहते हैं। लेकिन जैसी कि कहावत है कि चाकू खरबूजे पर गिरे या खरबूज चाकू पर, दोनों ही स्थितियों में नेतृत्व निशाने पर है। भाजपा के अंतर्कलह से एक बात स्पष्ट है कि मौजूदा नेतृत्व सबको साथ लेकर नहीं चल रहा है और इसकी वजह से पार्टी में असंतोष है।

पिछले सालों में भाजपा का विस्तार हुआ और उसमें अलग-अलग किस्म के लोग आए, अरुण शौरी जैसे अभिजित बुद्धिजीवी से लेकर रिटायर्ड सैन्य अफसरों तक और पिछड़े, दलित, आदिवासी नेताओं और कार्यकर्ताओं तक। अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी का कद इतना ऊंचा था कि वे तमाम लोगों को जोड़े रखने में कामयाब हुए। लेकिन वाजपेयी के सक्रिय राजनीति से हट जने और आडवाणी के श्रीविहीन हो जाने के बाद ऐसा कोई सीमेंट नहीं बचा जो सबको जोड़ पाता।

मौजूदा नेतृत्व में न वैसा कद है, न ही ऐसा लचीलापन और विनम्रता कि वह सबको, खास कर वरिष्ठ सदस्यों को जोड़ कर रख सके। अब समस्या यह है कि जसवंत सिंह पर तुरंत-फुरंत कड़ी कार्रवाई करने वाला नेतृत्व अरुण शौरी के मामले में क्या करेगा। इसके अलावा वसुंधरा राजे सिंधिया भी मुसीबत बनी हुई हैं। और कुछ नेता भी नए मोर्चे खोल सकते हैं। संघ के नियंत्रण में नए नेतृत्व की शौरी की पेशकश कितनी व्यावहारिक है, यह तो संघ और भाजपा के नेता जानें, लेकिन उनकी यह बात तो सही है कि भाजपा कटी पतंग की हालत में है।

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