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26 जनवरी, 2020|7:53|IST

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दो टूक (25 अगस्त, 2009)

बिजली के दाम की कहानी जरा हटकर है। इस लड़ाई में दोनों तरफ कौरव हैं। एक तरफ आम बिजली उपभोक्ता है जो चाहता है कि बिजली की दरें हमेशा जस की तस बनी रहें। दूसरी तरफ सरकार है जो घात लगाकर चुनाव संपन्न होने का इंतजार करती है और अंटी में वोट आते ही दरें बढ़ा देती है।

एक तरफ उपभोक्ता का स्वार्थ है दूसरी तरफ राजनीति का। एक तरफ यह जिद है कि तनख्वाहें चाहे कितनी बढ़ जाएं, बैलेंसशीट चाहे जितनी गुलाबी हो जाएं, लेकिन बिजली उतनी ही सस्ती मिलती रहे। दूसरी तरफ यह जिद कि पांच साल तो बात लागत आधारित कीमतों और आर्थिक सुधारों की करेंगे लेकिन चुनाव आते ही सियासी लबादे ओढ़ लेंगे। बेहतर हो कि लोग दामवृद्धि को तर्क के नजरिए से देखें। हमेशा सब्सिडी का मोहताज क्यों बने रहना?

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  • Web Title:दो टूक (25 अगस्त, 2009)