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नेपाल को भारतीय मदद का मतलब

कूटनीतिक हलकों में 20 अरब रुपये की भारतीय सहायता को ‘नेपाली मार्शल प्लान’ कहा जा रहा है। इस प्लान के कारण ल्हासा से लेकर काठमांडो तक के चीनपरस्त पस्त हैं। 81 करोड़ 40 लाख रुपये की कथित चीनी सहायता के जवाब में भारत का 200 करोड़! तीन माह पहले प्रचंड जब प्रधानमंत्री थे, तो चीन ने समग्र संधि करने की तैयारी कर ली थी, और बदले में नेपाल को 81 करोड़ 40 लाख रुपये की सहायता का वादा किया था।
मगर अफसोस कि प्रचंड इस संधि के लिए तीसरी दफा पेइचिंग नहीं जा सके, और तीन दिन पहले उन्हें इस्तीफा देना पड़ा था। प्रचंड की प्रतिक्रिया है कि माधव नेपाल की भारत यात्रा शर्मनाक रही है। माधव नेपाल पर शुरू से यह दबाव था कि वह भारत से किसी तरह की संधि न करें। फिर भी अंतिम समय में संशोधित व्यापार समझोते पर हस्ताक्षर हुए। इस बात पर मंथन शुरू है कि भारत ने जो कार्ड खेला है, उसकी काट क्या होनी चाहिए।
माओवादियों के लिए फिलहाल इसकी काट यही दिख रही है कि माधव नेपाल की सरकार गिरा दी जाए। ‘तिहार’, यानी दशहरा तक इसे अंजाम दे देना है। माधव सरकार को समर्थन दे रही 22 पार्टियों में, ‘पीठ में छुरा मारने वाले मित्रों’ की पहचान शुरू हो गई है। यूरोप से लौटने के बाद प्रचंड का एक ही एजेंडा है- ‘सत्ता पर फिर से सवार हो जाओ।’ प्रचंड को आने वाले दिनों में गिरिजा प्रसाद कोइराला और उनकी वारिस सुजाता से सहानुभूति होने लगे तो आश्चर्य नहीं होनी चाहिए। पर्दे के पीछे इसके प्रयास शुरू हैं।

हालांकि नेपाली कांग्रेस के कार्यकारी अध्यक्ष सुशील कोइराला माधव सरकार को नया संविधान बनने तक समर्थन देने की बात हर मंच पर कहते दिख रहे हैं। पर यह पक्के तौर पर नहीं कहा जा सकता कि कब पार्टी सुजाता कोइराला के कारण अपने फैसले से पलट जाए। विदेश मंत्री सुजाता कोइराला हर हाल में नेपाल की उपप्रधानमंत्री बनना चाहती हैं। उन्होंने कहा, ‘सांसदों की संख्या के आधार पर हमारा पहला हक बनता है कि उपप्रधानमंत्री का पद हमें मिले।’ सुजाता ने अपनी बात मनवाने के लिए यही समय क्यों चुना? इस प्रश्न का उत्तर देने से उनकी पार्टी के बड़े नेता भी कतरा रहे हैं। नेपाली कांग्रेस कार्यकारिणी ने इसकी कैफियत तलब की है, पर वहां भी लीपापोती हो रही है।

सत्तारूढ़ नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी ‘एमाले’ के मुख्य सचेतक भीम आचार्य ने कहा कि सुजाता ने सिर्फ मूर्खतापूर्ण हरक़त की है। एमाले के सांसद रवींद्र अधिकारी कहते हैं, ‘यह कोइराला परिवार की अराजकता है, नेपाली कांग्रेस इस पर क्या करती है, हमें देखना है।’ नेपाली मीडिया की माने तो सुजाता कोइराला दिल्ली जाने से पहले ब्यूटी पार्लर गई थीं और अपने लिए साड़ियों की ख़रीदारी तक कर चुकी थीं। शुक्रवार को सुजाता ने बयान दिया कि गले में इन्फेक्शन और सिरदर्द के कारण मैं दिल्ली नहीं गई। नेपाल में उपप्रधानमंत्री के पद पर आसीन विजय गच्छेदार को यह बर्दाश्त नहीं कि उनके बराबर सुजाता कोइराला बैठें। गच्छेदार ने प्रश्न किया कि एक म्यान में दो तलवारें कैसे रहेंगी?
अंदरूनी राजनीति से अलग नेपाल दक्षिण एशिया में आर्थिक आतंकवाद का केंद्र बन चुका है, इस सचाई को वहां के राजनेता भी कबूल करते हैं। पूर्वप्रधानमंत्री गिरिजा प्रसाद कोइराला ने पिछले साल कहा था कि मैंने 1971 में जाली भारतीय नोट प्रिंट कराकर बाज़ार में चलाया था। आज नेपाल में सत्तारूढ़ से लेकर विपक्षी नेता, अधिकारी, व्यापारी यहां तक कि मीडिया हाउस चला रहे चंद मुखौटों को पहचानना मुश्किल है कि कौन भारतीय जाली नोट के धंधे से जुड़ा है, कौन नहीं।
नेपाल में व्यापार, काम-धंधा ठप है, तो फिर हज़ारों की संख्या में झड़-झंखाड़ की तरह नव धनपति कहां से उग आये? इस सवाल का जवाब काठमांडो स्थित पाक दूतावास से ही मिल सकता है। यह बड़ी विद्रूप स्थिति है कि भारत-नेपाल में विकास के लिए अरबों रुपये ख़र्च कर रहा है, बदले में खरबों के जाली नोट भारत में खपाने की साजिश हो रही है। तो क्या पर्सा जि़ले के एस़ पी़ योगेश्वर रोम खामी की बात को सही मान लें कि आईएसआई नेपाल से हर माह 100 करोड़ के जाली नोट भारत में खपा रही है? नेपाली एस़पी़ खामी का यह भी अनुमान है कि 2010 तक 10 हजार करोड़ के जाली करेंसी नोट भारत में होंगे।

नेपाली अधिकारी अपनी बेबसी बताते हैं कि विएना कन्वेंशन के तहत वे दूतावास के डिप्लोमेटिक बैग को चेक नहीं कर सकते। पहले भारतीय जाली नोट क्वेटा, मुल्तान के प्रिंटिंग प्रेस से छप कर नेपाल आते थे। अब थाईलैंड, बांग्लादेश से आईएसआई काठमांडो के त्रिभुवन एयरपोर्ट पर भारतीय जाली नोट उतरवा रही है। मुश्किल यह है कि जाली नोट के धंधे में लगे हाई प्रोफाइल सांडों पर हाथ डालना सुरक्षा अधिकारियों के बस में नहीं है। भारत नेपाल के बीच प्रत्यर्पण संधि से सबसे अधिक चिंता पाकिस्तान को रही है। उसे डर है कि नेपाल में बसे कश्मीरी, जाली करेंसी के साथ दूसरे आतंकी कार्रवाई में लगे पाकिस्तानी और उनके गुर्गे इस संधि के बिना पर उठा नहीं लिये जाएं। पाकिस्तान के विदेश सचिव सलमान बशीर पिछले 27 जून को काठमांडो आये और नेपाल पर एक विशेष प्रत्यर्पण संधि के लिए दबाव बनाया कि जो पाक नागरिक नेपाल में हों, उन्हें किसी भी सूरत में भारत प्रत्यर्पित नहीं किया जाएगा।
नेता चाहे जो सफाई दें, पर नेपाल कभी भी बड़ी शक्तियों के प्रभाव से बाहर नहीं हो सकता। मिसाल के लिए, भारत-नेपाल सीमा पर 2005 में सात ‘चाइना स्टडी सेंटर’ चला करते थे, फरवरी 2008 में इनकी संख्या 19 हो गई। पिछले तीन साल में चीन के 546 व्यापारिक प्रतिष्ठान और निवेशक नेपाल आ जमें। काठमांडो के एक अखबार ‘रिपब्लिक’ ने दावा किया कि चीनी दूतावास ने 17 सितंबर 2007 को नेपाली सुप्रीम कोर्ट को एक पत्र भेजकर ‘भोट सोसाइटी’ नामक एनजीओ पर रोक लगाने को कहा था। यानी, नेपाली न्यायपालिका तक चीनी हस्तक्षेप से बरी नहीं है। चीन हिमालय के आर-पार रेल और सड़कों का जाल बिछा रहा है। काराकोरम होकर पाक के ग्वादर से ईरान तक रेल परियोजना और ल्हासा से खासा, फिर काठमांडो रेल के पीटे चीनी खेल का जवाब शायद पहली बार नई दिल्ली ने दिया है। नेपाल में भारतीय रोड-रेल का सामरिक महत्व तो है, पर इसका सकारात्मक पहलू यह है कि तराई से लेकर पहाड़ तक का कायाकल्प हो जाएगा!

pusprl@rediffmail.com
लेखक ईयू-एशिया न्यूज़ के नई दिल्ली स्थित संपादक हैं

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