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जतिवाद: पहचान छुपाने को विवश युवा

‘आप किसी के साथ काम करते हैं और सब ठीक चलता है, फिर एक दिन आपको घर पर बुलाया जाता है और आप हर समय ये सोचकर घबराते रहते हैं कि कहीं अगर आपने किचन में किसी चीज को छू लिया तो अगला कहीं नाराज न हो जाए’ यह शब्द बंगलुरु में रहने वाली सेंथारिल के हैं, जो पेशे से पत्रकार हैं पर इस पहचान के साथ उनकी एक पहचान और भी है, वह दलित हैं।
सेंथारिल कहती हैं कि वे कई दलित लड़कियों को जानती हैं, जिनकी जिंदगी हर समय पहचान खुल जाने के डर के बीच गुजरती है। स्वतंत्र भारत में सांस ले रही यह वह युवा पीढ़ी है, जिसे स्वयं की पहचान को नकारना पड़ रहा है, क्योंकि वह उस जिल्लत से बचना चाहती है जो उनकी प्रतिभा पर हावी हो जाती है।

हाल ही में प्रसिद्ध सिने अभिनेता शाहरुख खान के अपमान से तिलमिलाए कई लोग ‘नस्लवाद’ की बात करते हुए अमेरिकाको कोसने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ना चाहते थे, पर क्या खुद हमारा देश उस कठघरे में नहीं खड़ा है, जहां अपनों से भेदभाव किया जाता है। गांवों से शहरों की ओर प्रवास करने वाले दलित युवाओं ने कभी यह स्वप्न में भी कल्पना नहीं की होगी कि जिस पीड़ा को सदियों से उनके पूर्वजों ने झेला है, उसके दंश आधुनिक कहे जाने वाले शहरी समाज में चुभेंगे। आधुनिक शहरों में भी हर कोई जनना चाहता है कि उसके साथ खड़े व्यक्ति का सरनेम क्या है? यह सरनेम व्यक्ति के नाम और प्रतिभा दोनों पर भारी दिखाई देता है।

अगर ऐसा न होता तो शहरों में दलित अभिभावक अपने बच्चों की पहचान छुपाने के लिए विवश नहीं होते। दोहरा व्यक्तित्व, जीवन के लिए किसी भी रूप में हितकारी नहीं कहा जा सकता पर ऐसा हो रहा है। मेरे मां-बाप ने मुझे कभी ये बात नहीं बताई थी। दलित होने की वजह से हुए कड़वे अनुभवों और अपमान के चलते उन्हें शायद लगा कि मुझे नहीं बताना बेहतर होगा। उन्होंने एक नकली जाति निंबेकर रख ली थी ताकि मैं ऊंची जाति का हिंदू लगूं। यहां तक कि उन्होंने कभी मेरे लिए अनुसूचित जाति प्रमाण-पत्र बनवाने की भी कोशिश नहीं की। इसलिए स्कूल और कॉलेज के दौरान मैं एक तरह से छिपा हुआ दलित रहा। मैंने अपनी वास्तविक पहचान 18 साल की उम्र में जाहिर की। सुमित बौद्ध का ये अनुभव उसकी जद्दोजहद और मानसिक यातना को बतलाने के लिए काफी है।

यूं तो ग्रामीण अंचलों में जब कभी दलितों के ऊपर अत्याचार की घटना सामने आती है तो कुछ दलित नेता मुखर होते नजरआते हैं, पर यह मुखरता सिर्फ वोट बैंक की जुगत करते दिखाई देती है। हम सब इस पीड़ा से अनजान हैं कि आधुनिक चकाचौंध में लिप्त शहरों में कहीं कुछ टूट रहा है। देश में आज बड़ी तेजी से एक ऐसा वर्ग फैल रहा है, जो आरक्षित वर्ग का होने पर भी आरक्षण नहीं चाहता, क्योंकि वह उस वेदना को जीना नहीं चाहता जो उसकी पहचान सामने आते ही उसकी झोली में स्वत: ही आ जाती है। ‘शिक्षा’ मानव और मानव के मध्य व्याप्त हर विभेद को समाप्त करने का शस्त्र है’ यह तथ्य झूठा सिद्ध हो रहा है। आज दलित अधिकारों के लिए लड़ने वाले अनूप ने एक समय स्वयं की पहचान छुपाने के लिए खुद को राजपूत बताया था। वह इस बात से बहुत आहत है कि उच्च शिक्षा के क्षेत्र में न केवल साथी छात्रों द्वारा बल्कि प्राध्यापकों द्वारा जातिगत कटाक्ष किए जाते हैं।

अगर आप यह मान रहें कि यह सोच निम्न वर्ग से लेकर मध्यमवर्गीय णी तक ही सीमित है तो आप गलत हैं, क्योंकि आनंद तेलतुंबडे (खैरलांजी : अ स्ट्रेंज एंड बिटर क्रॉप, किताब के लेखक) को जातिगत भेदभाव सबसे पहले मुंबई के एक कॉरपोरेट ऑफिस में झेलना पड़ा था। बकौल आनंद ‘अंबेडकर के नेतृत्व ने दलितों में आत्मविश्वास जगाया। मगर अंबेडकर के बाद क्या हुआ? बिखरते, नोटों के लिए बिकते और आरक्षण को रामबाण की तरह पेश करते हमारे नेता आखिर नौजवानों में गर्व और आत्मविश्वास की भावना कैसे जगा सकते हैं?’ यह सच है कि जड़ों से कटकर पनपना मुश्किल होता है, अगर हुआ भी तो इसमें पीढ़ियां लग जाती हैं। अपनी ही जन्मभूमि में प्रताड़ना, अपमान और तिरस्कार दलित युवाओं को कुंठित कर रहा है, जिससे वह न केवल सामाजिक बल्कि आर्थिक तौर पर भी पिछड़ रहे हैं। विश्व मानचित्र में अगर भारत को स्वयं की छवि मानवीय रखनी है तो विभेद की रेखा को मिटाना ही होगा।


लेखिका समाजशास्त्र की प्रवक्ता हैं
saraswatritu@yahoo.co.in

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