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कर्म की प्रेरणा

गीता में कृष्ण ने कहा है कि मनुष्य को केवल कर्म करने का ही अधिकार है, उसे फल की कामना नहीं करनी चाहिए। पर मनुष्य कर्म तभी कर सकता है, जब उसमें कोई प्रेरणा जागे। प्रेरणा अंदर से आती है, इसे खरीदा नहीं जा सकता। किसी में यह ज्यादा होती है तो किसी में कम। पर हर इंसान को इसकी जरूरत होती है, ठीक वैसे ही जैसे शरीर को कसरत की या पौधों को पानी की। प्रेरणा के मूल में क्या है? कुछ पाने की, प्रभुता की या किसी से जुड़ने की इच्छा। प्रसिद्धि, पहचान, धन या इज्जत की इच्छा को भौतिक इच्छाओं में गिना जाता है। कुछ इच्छाएं आत्मा से जुड़ी होती हैं।

परमात्मा में विश्वास हमें अच्छे कामों की ओर प्रेरित करता है। ऐसे कर्मो के पीछे बदले में कुछ पाने की कामना नहीं होती, क्योंकि ये काम अपने आप में ही हमें इनाम की तरह लगते हैं। जैसे किसी भूखे को भोजन खिलाने के बाद उसके चेहरे की तृप्ति अपने मन को पूरी तरह संतुष्ट कर देती है। कुछ काम न तो कुछ पाने के लिए किए जाते हैं, न परमार्थ के लिए। वे सिर्फ हमें आत्म-संतोष देते हैं।
उनसे धन लाभ न हो या प्रसिद्धि भी न मिले, पर जो आंतरिक उपलब्धि की भावना होती है, उसके पीछे हमारी केवल कर्म करने की भूख होती है, जो उससे पूरी होती है। पर कर्म या उसकी प्रेरणा के साथ एक सावधानी जरूरी
होती है। हमारी या हमारे आस-पास किसी की भी प्रेरणा गलत इच्छा से उद्भूत न हो, क्योंकि प्रेरणा सदा सही लक्ष्य के लिए हो,
जरूरी नहीं है। कई बार यह ठगिनी का रूप धर कर गलत दिशा में धकेल देती है और फिर तरह-तरह से उसे सही साबित करने की कोशिश करती है। भौतिकता में लिप्त दुर्बल आदमी के लिए यह स्थिति बार-बार आती है। शायद इसीलिए कहा जाता है कि केवल फल की कामना से प्रेरित कर्म में यह खतरा ज्यादा होता है।

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