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कुर्सी न जाए

अभी पिछले दिनों एक नेताजी ने कहा कि जान दे दूंगा पर कुर्सी नहीं छोड़ंगा। लोग उनकी कुर्सी के पीछे वैसे ही पड़े हुए हैं, जैसे किसी की जान के पीछे पड़ जाते हैं। जैसे जान प्यारी होती है, वैसे ही कुर्सी भी प्यारी होती है। जान के पीछे पड़ते तो वे यह कतई नहीं कहते कि कुर्सी दे दूंगा, पर जान नहीं दूंगा। पर कुर्सी के पीछे पड़े तो उन्होंने कहा कि जान दे दूंगा, पर कुर्सी नहीं छोड़ूगा। उन्होंने साबित किया है कि कुर्सी के आगे जान की कोई कीमत नहीं।

जान जाए, पर कुर्सी न जाए। यह प्राण जाए पर वचन न जाए वाला मामला नहीं है। यह वैसा मामला भी नहीं है, जैसा किपिछले दिनों एक नेताजी ने महिला आरक्षण विधेयक का विरोध करते हुए कहा था कि अगर विधेयक पास हुआ तो जहर खा लूंगा।
अपने यहां किसी चीज के बदले जान देनेवालों की कमी नहीं है। भूखा आदमी रोटी के लिए जान दे देता है। औरत अपनी आबरू के लिए जान दे देती है। किसान अपनी जमीन के लिए जान देते हैं। मजदूर की नौकरी चली जाए तो वह उसके लिए जान दे देता है। बिजनेसमैन का बिजनेस फेल हो जाए तो जान दे देता है।

पहले तो लोग दोस्तों के लिए भी जान दे देते थे। इधर दोस्तों की जान लेने का चलन ज्यादा हो गया है। पहले लोग इश्क के लिए भी जान दे देते थे। पर इधर इश्क काफी कमीना हो गया है और जान देने की बजाय जान लेने को ज्यादा तरजीह देने लगा है।
वैसे हरियाणा और पश्चिम उत्तर प्रदेश में ऐसे जांबाज अब भी काफी पाए जाते हैं। यहां युवा लड़के-लड़कियां ऐसी राह पर चलने लगे हैं कि परिवार छूटे तो बेशक छूट जाए, गांव छूटे तो बेशक छूट जाए। पर साथी का हाथ न छूटे। उसके लिए वे जान देते हैं। परिवार वाले भी ऐसे हो गए हैं कि अपनी झूठी इज्जत के बदले बच्चों की जान पंचायत वालों के हवाले कर देते हैं और कई बार तो खुद भी ले लेते हैं।
पर नेताजी की जान ऐसी सस्ती नहीं। उनकी जान के लिए सरकार करोड़ों रुपए खर्च करती है। सुरक्षा का इंतजाम करती है। अपनी जान की सुरक्षा के लिए वे संसद ठप्प कर देते हैं। सरकार डर कर उन्हें वाई श्रेणी के बदले जेड श्रेणी की सुरक्षा दे देती है। पहले के नेता देश के लिए जान देने के लिए उतावले रहते थे। फांसी पर झूल जाते थे। अब कुर्सी के लिए जान देने पर आमादा हैं।

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