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अदालत और आत्ममंथन

जजों की संपत्ति के ब्योरे से संबंधित कानून भले ही सांसदों के तीखे विरोध की वजह से लोकसभा से लौट आया, लेकिन इसका एक अच्छा परिणाम निकला। इस मुद्दे पर न्यायपालिका के भीतर और बाहर एक बहस छिड़ गई है। यह बहस आमतौर पर विचारोत्तेजक और ज्ञानवर्धक है और हमें उम्मीद करनी चाहिए कि यह विवाद आरोप-प्रत्यारोपों के स्तर पर नहीं जाएगा। इससे यह भी पता चलता है कि खुद न्यायपालिका के अंदर न्यायाधीशों की सार्वजनिक जवाबदेही को लेकर गहरा विचार मंथन औरमतभेद मौजूद हैं, और वे भी न्यायपालिका की विश्वसनीयता को लेकर विचार कर रहे हैं। यह मताधिक्य और मंथन भीन्यायपालिका की विश्वसनीयता बढ़ाता है। सबसे ज्यादा विचारोत्तेजक लेख कर्नाटक हाईकोर्ट के न्यायाधीश शलेश कुमार ने लिखा है। संक्षेप में उनका मानना है कि संविधान ने उच्च न्यायपालिका को काफी संरक्षण दे रखा है, इसलिए जजों को असुरक्षित महसूस करने की वजह नहीं है। दूसरे, न्यायपालिका की असली शक्ति जनता का उसमें विश्वास है और संपत्ति का ब्योरासार्वजनिक करने से बचने से वह विश्वास कम होता है। इसके अलावा, यह सोचना सही नहीं है कि जज संपत्ति की घोषणा करना नहीं चाहते, क्योंकि जब कोई हाईकोर्ट का जज बनता है उसके पहले वह अपनी संपत्ति की घोषणा करता ही है। शैलेश कुमार के अलावा पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट के एक जज के. कन्नन ने भी अपनी संपत्ति का ब्योरा सार्वजनिक कर दिया है।

हर पेशे की तरह न्यायपालिका में भी कुछ गलत तत्व हो सकते हैं, लेकिन खासतौर पर उच्च न्यायपालिका की विश्वसनीयता आम लोगों में है। संपत्ति के ब्योरे पर हुए विवाद ने चाहे अनचाहे ऐसी धारणा बना दी है कि जज अपनी संपत्ति का ब्योरासार्वजनिक नहीं करना चाहते। ऐसे में शैलेश कुमार और के. कन्नन जैसे जजों ने एक महत्वपूर्ण कदम उठाया है और न्यायपालिका की विश्वसनीयता को मजबूत किया है। सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के. जी. बालकृष्णन इस बहस को आगे बढ़ाने का काम करें तो इससे न्यायपालिका मजबूत ही होगी। ऐसा कम ही होता है कि आम लोगों को ऐसे विषयों पर न्यायाधीशों के विचार मालूम होते हैं। यह एक ऐसा मौका है, जिससे आम जनता और न्यायपालिका के बीच संवाद मजबूत हुआ है। यह लोकतंत्र के हित में है।

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  • Web Title:अदालत और आत्ममंथन