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बर्बरता की हद

नैनीताल जिले के कालाढुंगी थाने में राजनेता की हिंसा और जनता की प्रतिहिंसा ने बर्बरता का जो दृश्य उपस्थित किया है, उससे शांतिप्रिय समाज की छवि पर गहरी चोट पहुंची है। राजनीतिक दादागिरी और जनता द्वारा कानून हाथ में लेने से जुड़ी हिंसा की घटनाएं उत्तर प्रदेश और बिहार के किसी इलाके में हों तो उतना आश्चर्य नहीं होता, क्योंकि ये इलाके ऐसी वारदातों के लिए जाने जाते हैं। हैरानी तब भी नहीं होती, जब फुटबाल मैच हारने के बाद कोलकाता के करीब पूरा वदिक गांव जला दिया जाता है। क्योंकि बंगाल के समाज में राजनीतिक हिंसा अंतर्निहित रही है और हाल में वहां के राज्यपाल गोपाल कृष्ण गांधी ने भी बढ़ती हिंसा पर चिंता जताई है। देश के अन्य राज्यों में भी राजनीतिक हिंसा और प्रतिहिंसा की घटनाएं रही हैं और उसने कहीं उग्रवाद तो कहीं आतंकवाद का रूप भी धारण कर रखा है। लेकिन उत्तराखंड राज्य, जो पहले उत्तर प्रदेश का हिस्सा था, कम से कम राजनीतिक हिंसा या पुलिस की क्रूरता से मुक्त रहा है। अगर पंजाब के आतंकवाद के दौरान तराई में हुई कुछ चर्चित वारदातों को छोड़ दिया जाए तो कालढुंगी या इससे पहले देहरादून में फर्जी मुठभेड़ जैसी घटनाएं यदा-कदा भी नहीं सुनाई पड़ती थीं। वहां न ही जनता के विभिन्न तबकों के बीच जाति, वर्ग और धर्म आधारित तनाव का वैसा रिश्ता रहा है, जिससे हिंसा फूटती है, न ही यह राज्य हिंदुत्व और सामाजिक न्याय की तनावपूर्ण प्रयोगशाला रहा है। वहां पुलिस और जनता के बीच दमन का वैसा रिश्ता भी नहीं रहा है जिसके खिलाफ थाने और उसमें मौजूद पुलिस अधिकारी जिंदा जलाए जाते हैं।

महिलाएं आर्थिक गतिविधियों में प्रमुख भूमिका निभाती रही हैं और आंदोलनों का नेतृत्व भी करती रही हैं, लेकिन नागपुर की तरह वहां की महिलाएं कभी दरांती लेकर थाने पर हमला कर दें, ऐसा सुना नहीं गया है। पर लगता है नया राज्य बनने से उत्तराखंड का तीव्र विकास होने के बजाय राजनीतिक बुराइयों का तीव्र प्रवेश हो रहा है। एक पढ़े-लिखे और आमतौर पर कम विषमता वाले समाज में राजनेता, अफसर और ठेकेदारों का वह त्रिकोण बनता जा रहा है, जिसके लिए राज्य जनता की सेवा नहीं, लूट की निजी आकांक्षा को पूरा करने का उपकरण होता है। लेकिन अभी भी समय है हिंसा और लूट की इस मानसिकता से निकल कर एक छोटे राज्य को आदर्श रूप से विकसित करने का।

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  • Web Title:बर्बरता की हद