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एलईडी

एलईडी सेमीकंडक्टर डायोड होता है, जिसमें विद्युत धारा प्रवाहित करने पर यह प्रकाश का उत्सर्जन करता है। एलईडी कई प्रकार की होती है। इनमें मिनिएचर, फ्लैशिंग, हाई पावर, मल्टी कलर, अल्फान्यूमेरिक एलईडी, ओएलईडी प्रमुख है। मिनिएचर एलईडी का इस्तेमाल मुख्यत: इंडीकेटर में किया जाता है। लैपटॉप, नोटबुक, सेल्युलर फोन, डीवीडी प्लेयर, वीडियो गेम, पीडीए में इस्तेमाल होने वाली ओएलईडी (ऑर्गेनिक लाइट एमिटिंग डायोड) को एलसीडी और सीआरटी टेक्नोलॉजी से बेहतर माना जाता है। इसकी खासियत यह है कि इसे किसी प्लास्टिक फिल्म तक में लगाया जा सकता है।

इतिहास : एलईडी के बारे में पहली रिपोर्ट 1907 में ब्रिटिश वैज्ञानिक एच.जे.राउंड की मारकोनी प्रयोगशाला में एक प्रयोग के दौरान संज्ञान में आई थी। जनरल इलेक्ट्रिक कंपनी में काम करने के दौरान इसका पहला प्रायोगिक विजिबल स्पैक्ट्रम 1962 में निक होलोनक जूनियर ने बनाया। निक को एलईडी के पितामह के तौर पर जाना जाता है। एम. जॉर्ज क्रॉफर्ड ने पीली और लाल-नारंगी एलईडी की खोज की। इसका इस्तेमाल घड़ी, कैलकुलेटर, टेलीफोन, टीवी और रेडियो में किया जाता है।

फायदे  
- ऊर्जा की बचत में एलईडी उपयोगी होते हैं।
- इनका आकार छोटा होता है, जिसकी वजह से इन्हें प्रिटेंड सर्किट बोर्ड में लगाने में ज्यादा दिक्कत नहीं होती।
- दूसरे स्रोतों की तरह एलईडी ऊष्मा का विकिरण कम करते हैं। 
- एलईडी का जीवनकाल काफी होता है। एक रिपोर्ट के मुताबिक सामान्यत: इनका जीवनकाल 35,000 घंटे से 50,000 घंटे होता है। 
- दूसरे फ्लोरोसेंट लैंप की तरह एलईडी में मर्करी नहीं होती, जिससे इसके जहरीले होने की संभावना कम ही होती है।

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