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कोर विचारधारा के घनघोर समर्थक

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शारीरिक प्रमुखों की हाल में मंगलूर में हुई एक बैठक में कहा गया कि शाखाओं में आने वालों की संख्या घटती जा रही है। उनमें नौजवानों, खासकर ट्रेंडी नौजवानों को आकर्षित करने के रास्ते खोजने चाहिए। इसके लिए जरूरी है कि जो कुछ आउटडेट है, उसे बदलना चाहिए। शायद खाकी निक्कर इसका शिकार हो। शायद इसकी जगह ट्रैक सूट आएगा।खाकी निक्कर शायद इतना पुराना नहीं कि उसे लेकर आंदोलन छिड़े। वर्ना कोई कह सकता था कि यह हमारी कोर विचारधाराका हिस्सा है। कपड़े-लत्ते बदलना आसान है, क्योंकि वही आउटडेट होते हैं। विचार आउटडेट नहीं होते। होते भी हों तो बदलेनहीं जाते।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ राजनैतिक संगठन नहीं है। उसका संविधान उसे राजनैतिक बनने से रोकता है। अर्से तक कोशिश होती रही कि वह कांग्रेस का हिस्सा बन जाय। वह हिन्दू राष्ट्रवाद का स्वघोषित रक्षक है। पर ऐसा पहला संगठन नहीं है। 1907 मेंमुस्लिम लीग बनने के बाद दिसम्बर 1913 में अखिल भारतीय हिन्दू महासभा बन गई थी। कांग्रेस सदस्यों के एक फोरम के रूप में वह काम करती थी। बाद में उसने अलग पार्टी की शक्ल भी ली। बाद में बने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की राजनैतिक अभिलाषाएं भी थीं, पर उसने हिन्दू महासभा को अपनी पार्टी नहीं बनाया।
आजादी के ठीक पहले तीन जुलाई 1947 से ऑर्गनाइजर का प्रकाशन शुरू हुआ था। घोषित रूप में यह संघ का मुखपत्र नहीं था, पर अनौपचारिक रूप से था। संघ पर रोक लगने के बाद इसपर भी रोक लगी। पाबंदी हटने के बाद इसमें कमल उपनाम से बलराज मधोक के कुछ लेख छपे, जिनमें संघ से आह्वान किया गया था कि देश और धर्म की रक्षा के लिए कुछ करे। शुरू में लगता था कि संघ को ही राजनैतिक दल बनाने का इरादा है। अफवाहें थीं कि गुरु गोलवलकर ने प्रांतीय संघ चालकों को निर्देश दिए हैं कि वे चुनाव लड़ने के लिए तैयार रहें। इन खबरों का तत्काल खंडन किया गया। पर संघ के भीतर-बाहर राजनैतिक चिंतन निरंतर चल रहा था। 
संघ के पास विचार था, नेता नहीं था। 1950-51 में हालात ऐसे बने कि नेता को संगठन मिला और संगठनकर्ताओं को नेता। श्यामा प्रसाद मुखर्जी महासभा में थे। पूर्वी बंगाल में हिन्दुओं की दशा पर क्षुब्ध होकर उन्होंने 19 अप्रैल 1950 को कैबिनेट से इस्तीफा दिया। उसी शाम दिल्ली के कुछ नागरिकों ने उनका अभिनन्दन किया। इसे दिल्ली ग्रुप कह सकते हैं। इनमें संघ के कार्यकर्ता और समर्थक ज्यादा थे। पांच मई 1951 को श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने कलकत्ता में पीपुल्स पार्टी बनाने की घोषणा की।उसके आठ सूत्री कार्यक्रम में अखंड भारत, पाकिस्तान की तुष्टि रोकने, शरणार्थियों के पुनर्वास, एक भारतीय संस्कृति का विकास करने वगैरह के मुद्दे थे। उधर 27 मई को दिल्ली वालों ने जालंधर में भारतीय जनसंघ बनाने की घोषणा कर दी। इधर-उधर कई तरह के संगठन और ग्रुप बनते रहे और फिर 21 अक्तूबर को दिल्ली में भारतीय जनसंघ बना।
यह संगठन कांग्रेस विरोध पर आधारित था। जनसंघ के प्रतिष्ठित जीवनीकार क्रेग बैक्सटर के अनुसार श्यामा प्रसाद मुखर्जी का पहला अध्यक्षता भाषण गुरु गोलवलकर की स्थापनाओं के मुकाबले उदार और असाम्प्रदायिक था। यह पार्टी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के एजेंडा को पूरा करने के वास्ते बनी है या हिन्दू राष्ट्रवाद की अधकचरी व्याख्याओं और कांग्रेस-विरोध के वृहद पर उदार मंच पर खड़ी है? तबसे आजतक यह सवाल अनुत्तरित है। श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने संघ के संगठन का सहारा लिया। दूसरी ओर पार्टी को व्यापक आधार दिया। अटल बिहारी वाजपेयी ने भी यही किया। संयोग नहीं कि श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने अपने निकट सहायक के रूप में अटल बिहारी वाजपेयी को चुना।
पिछले हफ्ते अमेरिकी समाचार पत्रिका में न्यूजवीक में छोटा सा आलेख छपा है, ‘वी आर ऑल हिन्दूज नाव।’ लेखिका ने ऋग्वेद के हवाले से लिखा है कि सत्य एक है, पर ऋषि इसे अलग-अलग नाम देते हैं। यानी ईश्वर तक पहुचने के तमाम रास्ते हैं। दूसरे धर्म कहते हैं कि सिर्फ मेरा रास्ता ही सच्चा है। 2008 के प्यू सर्वे में 65 फीसदी अमेरिकनों का कहना था कि तमाम धर्म ईश्वरीय मार्ग पर ले जा सकते हैं। 35 फीसदी अमेरिकन अपने को रेलीजस के बजाय स्पिरीच्युअल कहना पसंद करते हैं। एक तिहाई से ज्यादा अमेरिकन दफनाए जाने के बजाय दाह संस्कार पसंद करते हैं। हिन्दू यानी बहुलता और सहिष्णुता। क्या यह हमारी ताकत है? उस विचार से जुड़े राजनैतिक दल की धारणा क्या है?
भारतीय पार्टी व्यवस्था मूलत: कांग्रेसी है। कांग्रेस विरोधी समाजवादी पार्टियां और कम्युनिस्ट पार्टिया तक कांग्रेसी संस्कृति में ढलीं हैं। भाजपा का मूल कार्यकर्ता कांग्रेसी संस्कृति के बाहर से आया। सत्तर के दशक और उसके बाद भाजपा का नारा था, हम इनसे फर्क हैं। हमें भी परखो। नेहरू ने कांग्रेस को हिन्दू राष्ट्रीयता से सायास अलग रखा। इससे भाजपा के लिए एक स्पेस पहले से बना था। कांग्रेस ने इसे देर से पहचाना। इंदिरा गांधी की 1980 के बाद की राजनीति 1977 की राजनीति से फर्क थी। इसी समझ की हड़बड़ाहट में 1989 में कांग्रेस ने अयोध्या में शिलान्यास कराया। पर देर हो चुकी थी।
1991 में कांग्रेस घटी, भाजपा बढ़ी। 1996 में ऐसा और बड़े स्तर पर हुआ। पर भाजपा में भी दुविधा है। वह अपनी कोरविचारधारा को कैसे छोड़ दे? क्या है उसकी कोर विचारधारा? कांग्रेस और भाजपा दोनों की दुविधाएं हैं। संघ के प्रयास से भाजपा बनी और उसके दम से वह चल रही है। उसके एजेंडा को वह किस हद तक साथ लेकर सफल होगी, यह यक्ष प्रश्न है। 2004 के चुनाव के ठीक पहले तक यह समझ में आता था कि कांग्रेस तो गई। उसकी जगह भाजपा ने ले ली है। पर वह कट्टर हिन्दूवादी भाजपा नहीं थी। तमिलनाडु और आंध्र की मामूली गलतियों के कारण इतिहास के देवता ने उसके सपनों को तोड़ दिया।
पाच साल के आलोड़न-विलोड़न के बाद इस साल भाजपा की ठुकाई और बेहतर हुई। संघ और उसके अनुषंगी संगठन जिधर ले जना चाहते हैं, उस दिशा में पाल घूम नहीं रहे हैं। संघ युवा नेतृत्व चाहता है, पर नौजवान आना नहीं चाहते। शायद ट्रैक सूट उन्हें आकर्षित करे। पर क्या खादी का कुर्ता या ट्रैक सूट पहनने से विचार बदल जते हैं? मुख और मुखौटे की वचारिक दुविधा सिर्फ भाजपा में नहीं है। कांग्रेस, कम्युनिस्ट और समाजवादी सबके सब दुविधा में हैं। सब आउटडेट हैं, और मेकओवर चाहते हैं।
pjoshi@hindustantimes.com
लेखक ‘हिन्दुस्तान’ में दिल्ली संस्करण के वरिष्ठ स्थानीय संपादक हैं

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