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उर्दू मीडिया: जिन्ना, जसवंत के बहाने

‘जिन्ना-इंडिया पार्टिशन, इंडिपेंडेंस’ में नेहरू व पटेल को पाकिस्तान के जनक मोहम्मद अली जिन्ना के मुकाबले बंटवारे का ज्यादा जिम्मेदार ठहराने की जसवंत सिंह की दलील को कुछ उर्दू अखबार मुसलमानों को पटाने की भाजपा की कोशिश समझ रहे थे।
पार्टी ने जब अपने तीन दशक पुराने वरिष्ठ नेता को दरगुजर कर भाजपा शासित प्रदेशों में पुस्तक पर बैन लगाने का ऐलान किया तो उनकी नीयत पर शक करने वाले अखबार भी समर्थन में उतर आए। किताब रिलीज होने से अब तक जसवंत अखबारों की सुर्खी बने हुए हैं। उनकी शख्सियत और ख्यालात के कसीदे काढ़े ही जा रहे। ‘विनाश काले विपरीत बुद्धि’, ‘चिंता बनाम चिंतन’, ‘जसवंत सिंह का गुनाह’ आदि संपादकीय लिखकर भाजपा पर ताबड़-तोड़ हमले का दौर भी चल रहा है। ‘जदीद खबर’ में एबी मसूद लिखते हैं, बीजेपी अब किस मुंह से तस्लीमा नसरीन की हिमायत करेगी। जबकि सहाफी जफर आगा कहते हैं- ‘तकसीम के तल्ख हकीकत से फरार की कोशिश कब तक।’ ‘सहाफत’ ने ‘ जसवंत सिंह के फर्राटेदार अंग्रेजी बोलने का गुणगान किया है। अखबार लिखता है, उनकी पृष्ठभूमि आरएसएस की नहीं होने से उन्होंने कभी साम्प्रदायिक बातें नहीं कीं। एक अखबारजिन्ना को कुछ इस तरह सही ठहराता है-‘उन्हें बंटवारे पर अफसोस था। पाक के गठन से तीन दिन पहले 11 अगस्त 1947 को उन्होंने कहा था, वक्त गुजरने के साथ इस रियासत (पाकिस्तान) में हिंदू, हिंदू नहीं रह जाएगा। मुस्लिम, मुस्लिम मजहबीएतबार से नहीं, सियासी शहरियत के ऐतबार से बदल जएंगे।’ अधिकांश उर्दू अखबार समझते हैं-‘जसवंत सिंह की किताब से तालीम याफ्ता लोगों के जहनों में तने हुए जल की कुछ सफाई होगी।’ उर्दू मीडिया समझता है जिन्ना उतने बुरे नहीं थे जितना कि पेश किया गया। अखबारों ने वरिष्ठ ब्रिटिश पत्रकार मार्क टुली के उस बयान को भी कोट किया है। जिसमें कहा गया कि बंटवारे के लिए किसी एक को जिम्मेदार ठहराना ठीक नहीं। सभी से गलती हुई है। एक अखबार लिखता है, जिन्ना को सेक्यूलर और बंटवारे के लिए नेहरू व पटेल को ज्यादा जिम्मेदार ठहराने पर भाजपा से ज्यादा कांग्रेस का गुस्सा होना लाजमी है। कांग्रेसी इसे अपने नेताओं पर हमला मानते हैं। एल. के. आडवाणी ने जब पाकिस्तान में जिन्ना की मजार की जयारत की और उन्हें सेक्यूलर बताया था, तब भी बीजेपी से ज्यादा कांग्रेस ने हाय-तौबा मचाई थी। जिसका खामयाजा आडवाणी को अध्यक्ष की कुर्सी गंवा कर चुकानी पड़ा था। कांग्रेस के बवाल मचाने से अब जसवंत बलि चढ़ गए। ‘हमारा समाज’ अपने संपादकीय-‘जसवंत सिंह का इंकशाफ’ में भविष्यवाणी की है, किताब ऐतिहासिक तथ्यों पर आधारित होने से आगे चलकर जसवंत की मुखालफत कमजोर पड़ेगी। एक ने लिखा है ‘हम कब तक हकीकत से आंखें चुराएंगे।’ ‘मुंसिफ’ ने जिन्ना को सही ठहराने के लिए 1916 के लखनऊ समझोते का जिक्र किया है। बात जब पाकिस्तान के कायदेआजम की हो तो भला इसमें पाक मीडिया आहूति डालने से कैसे चूक सकता है।बीबीसी उर्दू पोर्टल के मुताबिक, जसवंत पाक में हीरो बन गए हैं। ‘डॉन’ में हमीद हारून और ‘आजकल’ अपने संपादकीय में लिखते हैं- ‘चूंकि जसवंत सिंह मुसलमान नहीं, हिंदुओं का समर्थन करने वाली पार्टी के सीनियर लीडर रहे हैं। इसलिए उनकीबातों पर यकीन किया जाएगा।’ एक दिलचस्प बात और। अभी जब जिन्ना के सही या गलत होने को लेकर बहस छिड़ी है। पाकिस्तान की चर्चित स्तंभकार जहिदा हिना ने जिन्ना की जिंदगी के अंतिम दौर में उनकी और पाकिस्तान की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले उनके साथियों की उपेक्षा और दुर्दशा का कच्च-चिट्ठा खोला है। हिना- ‘क्या जमाने में पनपने की यही बातें हैं?’ में पर्दा उठाती हैं-‘ कायदे आजम का दम जब लबों पर था। उन्होंने जेयरारत रेजिडेंसी से कराची जने की ख्वाहिश का इजहार किया। हमने उनकी ख्वाहिश का ‘ऐहराम’ इस तरह किया कि गर्वनर जनरल और पाकिस्तान के बानी को कराची एयरपोर्ट से उनके क्यामगाह तक ले जाने को जो ऐंबुलेंस फराहम की वह इतनी खस्ता थी। रास्ते में ही खराब हो गई। उनकी बहन सिरहाने बैठकर उन्हें अंतिम सांसें लेते देखती रहीं।’ अपनी उपेक्षा से खिन्न राज साहब महमूदाबाद 14 अगस्त 47 को कराची छोड़कर ईरान चले गए। दलित नेता व जिन्ना के करीबी जोगेंद्रनाथ मंडल को 1953 में पाक मंत्रिमंडल से बाहर कर दिया गया। उनके दोस्त और ईसाई लीडर फादर फ्रांसिस नदीम, यूएनओ में कश्मीर की वकालत करने वाले जफरुल्लाह खां, ख्वाज नाजिमुद्दीन, हुसैन शहीद सहरवर्दी के साथ भी बदसलूकी की गई। और तो और। मोहम्मद अली जिन्ना की बहन फातिमा जिन्ना को भी साजिश रचकर कौमी एसेंबली में जाने से रोका गया।
लेखक ‘हिन्दुस्तान’ से जुड़े हैं
malik_hashmi64@yahoo.com

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