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एक थे वाल्तेयर

वाल्तेयर ईश्वर की सत्ता को खारिज करते थे, किंतु मानवीयता और उदारता की शक्ति उनमें विपुल थी। उनकी पूंजी थी तोकेवल सच कहने का स्वभाव और जीवन मूल्यों के प्रति ईमानदारी भरा समर्पण। उन्होंने हर बौद्धिक चुनौती का साहसपूर्वक सामना किया और जो भी लिखा, तर्क की कसौटी पर ठोक-पीटकर। 21 नवंबर, 1694 में पेरिस में जन्मे वाल्तेयर ने होश संभालते ही धर्म और राजसत्ता का स्वार्थ प्रेरित तालमेल समाज पर हावी पाया। ऐसे में उनका विद्रोही स्वभाव आकार लेने लगा और वे धर्म और धार्मिक प्रवृति की आलोचना करने लगे। स्कूल में एक शिक्षक ने उनके बारे में कहा था- ‘शैतान, तुम एक दिन फ्रांस में अव्वलदर्जे की बहसबाजी का नमूना लेकर आओगे।’ वे ईश्वर के बारे में कहते-‘ईश्वर एक ऐसा पहिया है, जिसकी धुरी हर जगह है परंतु उसका घेरा नदारद है।’

इसी तरह एक जगह वे लिखते हैं-‘ईश्वर एक जोकर या मजाकिया है। जो उन लोगों के लिए तमाशा दिखाता है, जिन्हें हंसनेसे भी डर लगता है’। उनका मानना था कि धर्म का उपयोग वे ही करते हैं, जो किसी न किसी प्रकार आधुनिकताबोध औरज्ञान-विज्ञान से कटे रहना चाहते हैं और परमात्मा नाम के मिथक की सर्जना केवल इसलिए हुई कि यथास्थितिवादियों की राह में कोई बाधा न आए। बुद्धिजीवियों को वे प्यारे थे, किंतु परंपरावादियों को बिल्कुल न सुहाते। धर्म और राजा की आलोचना के कारण जेल गए, देश निकाला हुआ लेकिन इससे उनकी ताकत बढ़ती ही गई। पेरिस, लंदन, बर्लिन, जिनेवा दर-ब-दर फिरते रहे और लिखते रहे। उन्होंने कई पुस्तकें लिखीं। जैसे- ‘फिलॉस्फिकल लेटर्स ऑन द इंग्लिश’, ‘द एस्से अपॉन द सिविल वार इन फ्रांस’, ‘कांदीद’, ‘ड्रिटाइब द डॉक्टयोर एकाकिया’ आदि। वे मानव की सर्वागीण स्वतंत्रता के समर्थक थे। वे मानते थे कि स्वार्थी धर्मसत्ता और राजसत्ता के बीच धर्मसत्ता अधिक व्यापक और असरकारी है। इसे वे मानव की आजादी के लिए बाधक मानते और कहते थे कि यदि मानव आजाद जन्मा है तो उचित यही है कि वह सदैव आजाद रहे। 

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