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विवाद की गैस

आखिर अनिल अंबानी के बेताली सवालों ने सरकारी विक्रमादित्य को बोलने पर मजबूर कर दिया। लेकिन सरकारी जवाब सेसवालों के खामोश होने के बजाय बढ़ने की आशंका बनी हुई है। सरकार ने मामला अदालत में लंबित होने का कारण बताते हुए पूरे जवाब तो नहीं दिए, लेकिन इतना जरूर कहा है कि कृष्णा गोदावरी तेल क्षेत्र में मुकेश अंबानी की गैस परियोजना से सरकार को उस आरोपित राशि से कई गुना ज्यादा फायदा होगा। सरकार ने यह भी भरोसा दिया है कि वह एनटीपीसी के हितों को संरक्षण देने के लिए प्रतिबद्ध है। लेकिन इस जवाब पर दूसरी तरफ से व्यंग्य भरी टिप्पणियों का आना बंद नहीं हुआ है। पिछले कुछ दिनों का जो विज्ञापन अभियान सरकार को बहुत नागवार गुजरा है और जिसे उसने गुमराह करने वाला बताया है, उससे सरकार की साख पर बट्टा भी लगा है। इसीलिए सरकार के बयान पर एक नहीं, चार महत्वपूर्ण मंत्रियों के दस्तखत हैं। लेकिन इस बयान से ही मामला न सुलझते देख प्रधानमंत्री ने दोनों भाइयों से राष्ट्रहित में झगड़ा बंद करने की भी अपील की है। जहिर है इस विवाद से वैश्विक कॉरपोरेट जगत में यह संदेश जा रहा है कि पूंजीपतियों की प्रतिस्पर्धा में सरकार किसी एक का पक्ष लेती है, जो साफ सुथरे व्यावसायिक माहौल के लिए उचित नहीं है। लेकिन उससे आगे यह संदेश भी जा रहा है कि दो पूंजीपति भाइयों की कॉरपोरेट लड़ाई इतनी ढीठ हो चली है कि उसे शांत करने की क्षमता न सरकार में है, न ही अदालत में। हाल में बीएमडब्लू मामले में वकील आर. के. आनंद को सजा देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि जो मामला न्यायालय में लंबित हो उस पर प्रेस में बयान नहीं देने चाहिए। लेकिन अदालत के इस नीति वक्तव्य का पालन होने के बजाय खुला उल्लंघन हो रहा है।

यह सही है कि दो कॉरपोरेट घरानों की इस सार्वजनिक लड़ाई में बहुत सारे ऐसे तथ्य सामने आ रहे हैं, जो अभी तक जनता से छुपा कर रखे गए थे। बल्कि अंबानी समूह के पक्षपाती पूंजीवाद पर छपी ‘पॉलियस्टर प्रिंस’ जैसी किताब भी बिना प्रतिबंध के ही बाजार से गायब कर दी गई। इसलिए यह मानने की कोई वजह नहीं है कि अनिल अंबानी की कंपनी एडीएजी कोई बहुत पाकसाफ होगी और उसके सवाल बहुत निश्छल होंगे। लेकिन आक्षेप और पक्षपात के इस शोर-शराबे में न्याय करने की जिम्मेदारी विक्रमादित्य और उनके संस्थानों की है, क्योंकि उनकी प्रतिष्ठा ज्यादा दांव पर लगी है।

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