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जिन्ना, जसवंत और विभाजन

जिन्ना, जसवंत और विभाजन

पुस्तक: जिन्ना - भारत विभाजन के आईने में
लेखक: जसवंत सिंह
अनुवादक: ‘दुफैल’ चतुर्वेदी
प्रकाशक: राजपाल एंड संस, 1590, मदरसा रोड, कश्मीरी गेट, दिल्ली - 110006
मूल्य: 595 रुपये

नापसंद पार्टी अध्यक्ष को बदलने या किसी वरिष्ठ सदस्य को हटाने या विवादास्पद पुस्तकों पर ज्ञानप्रद बहसों की स्वस्थ परंपराएं हिन्दुस्तान की बड़ी राजनैतिक पार्टियों ने अब तक विकसित नहीं की हैं। इसलिए विवाद उठने पर रामराज्य के धोबी की परंपरा पर चलते हुए कानाफूसी स्तर की खबरें मीडिया में लीक कर दी जाती हैं। लेकिन चूंकि प्राय: पार्टी अध्यक्ष मर्यादा पुरुषोत्तम या विदेह जनक नहीं होते और असहमति के पक्ष में सकारात्मक और लोकतांत्रिक दबाव बन पाना पार्टी की परंपराएं लगभग असंभव बना देती हैं, इसलिए भाजपा में अंतत: मतभिन्नता की सजा दल से निष्कासन है और पुस्तक का प्रतिबंधित किया या बजरंगियों द्वारा जलाया जाना ही आम है। जसवंत सिंह की ताजा किताब और लेखक दोनों का हश्र भी इसका प्रमाण है।

रोचक यह है कि ऐतिहासिक तथ्यों की अवध्य गायों के खिलाफ जब जब भाजपा के भीतर स्वर उठे, तो तुरत कार्रवाई कर असहमति दर्शाने वाले को बाहर का रास्ता दिखाया गया। खुद पार्टी अध्यक्ष भी विगत में जिन्ना पर प्रशंसापरक टिप्पणी कर पदच्युत हो चुके हैं। फिर भी जिन्ना के जिन्न को विशालकाय पुस्तक की मार्फत छोड़ने का फैसला जसवंत सिंह ने किया और कुफ्र बकने वाली इस किताब : ‘जिन्ना : भारत विभाजन के आईने में’, पर अब सभी पार्टी-शासित प्रदेशों में प्रतिबंध लगाया जा रहा है। यह दु:खद है, लेकिन चौंकाता नहीं। संघ परिवार के घटकों में जिन्ना के प्रति उत्कट नफरत या नए सोच की राह खोलने वाली कलाकृतियों के प्रति द्वेष नया नहीं। और उन इतिहासकारों और कलाकारों से तो खासकर संघियों की लट्ठमलट्ठा होती आई है, जो उसकी इतिहास और संस्कृति विषयक धारणाओं को चुनौती देते हैं। यही वजह है कि जसवंत सिंह अपने गृहक्षेत्र में अभ्यागतों को हथेली से पारंपरिक तरह से अफीम का मधुपर्क पिला कर भी पार्टी की आलोचना का शिकार नहीं बने, पर विभाजन से जुड़ी ऐतिहासिक सामग्रियों का एक जांचा परखा संकलन तैयार करके इतिहास पिता हेरोडोटस बनने का प्रयास करते ही दल से निष्कासित कर दिए गए।

भाजपा के चिंतन शिविर से निकले इस पुस्तक की बाबत (शायद इसे बिना पढ़े) फटाफट न्याय ने साबित किया है कि पार्टी का नेतृत्व बूढ़ा भले हो चला हो, उसकी आत्मा पाकिस्तान और इस्लाम को लेकर अभी भी वरुण गांधी जैसी ही अवयस्क, असहिष्णु और पूर्वग्रहग्रस्त है। इसीलिए जसवंत सिंह के निष्कासन की मांग करने वालों में पार्टी के बूढ़े और जवान (तुलनात्मक रूप से) सभी के सुर एक समान थे। ‘हमारी समझदारियां भी अब इतनी खीझभरी हो गई हैं, कि रोजमर्रा की बातें भी अविश्वास का स्नेत बन गई हैं। ..अब हमारे पास केवल गुस्से में बुदबुदाते मतभेद हैं, और उसे भी अविश्वास की एक स्थायी धुंध घेरे है.. हमारा अतीत वास्तव में अतीत में कभी बदला ही नहीं, वह स्थायी रूप से हमारा वर्तमान बना हुआ है। इसलिए वह हमें सदैव यादों के कैदखाने से बाहर निकलने से रोकता है।’ (पृ. 472-73) किताब की यह विडंबनामय पंक्तियां उसके ताजा हश्र पर भी चस्पां की जा सकती हैं।

यह एकदम सच है कि जिन्ना धर्माधारित दो अलग राष्ट्रों की कल्पना के मूल निर्माता नहीं थे। यह परिकल्पना वीर सावरकर की थी। और इस बात के भी पुष्ट प्रमाण हैं, कि दस लाख लोगों को बेघर रिफ्यूजी बनाने वाले विभाजन के दंगों के लिए उस वक्त के कमोबेश सभी बड़े नेता तथा तत्कालीन ब्रिटिश हुक्मरान समवेत रूप से जिम्मेदार हैं। जिन्ना द्वारा कलकत्ते में 16 अगस्त, 1946 को सीधी कार्रवाई के आह्वान के बाद दंगे फूटे, यह सच है, तो यह भी उतना ही सच है कि बंगाल के तत्कालीन गवर्नर ने वाइसरॉय की स्वीकृति लेकर दंगों के बीच तीन दिन के लिए सारी पुलिस को छुट्टी पर भेज दिया था, क्योंकि उन्हें डर था कि ब्रिटिश सरकारी पुलिस ने दंगाइयों का दमन किया, तो इसकी संभावित प्रतिक्रिया से बचेखुचे योरोपियन अफसरान की जान जोखिम में पड़ सकती है।

‘विभाजन हुआ तो हमने उसे स्वीकार कर लिया क्योंकि हमें लगता था इस तरह..शायद शांति स्थापित हो सकेगी..(लेकिन) वह हुआ नहीं और दंगे होते चले गए। शायद यह दंगे हिंदुस्तान और पाकिस्तान के शासकों की गलती या क्षुद्रता के कारण हुए।’ यह नेहरू ने भी ईमानदारी से स्वीकारा है। (भोपाल नवाब के साथ पत्रव्यवहार, 1948)
पुस्तक के अंतिम भाग में भारत पाकिस्तान और भारत की अंतरात्मा को लगातार मथने वाले विभाजन को लेकर जो भी जसवंत सिंह ने लिखा है वह पूरा सच भले न हो किन्तु सच के अलावा कुछ भी न होने का आभास तो देता ही है। स्वतंत्रतापूर्व की राजनैतिक गुटबंदियों, तकरारों, विशिष्ट जनों की मुलाकातों, सहमतियों और असहमतियों पर जो ब्योरे विभिन्न स्नेतों से जमा करके पुस्तक में दिए गए हैं, वे विद्वज्जनों के लिए शायद अज्ञात न हों, लेकिन देश के सामान्य पाठक को अतीत के कष्टकर अध्यायों और सयत्न छुपाए गए प्रकरणों से दो-चार तो कराते ही हैं। इसलिए ऐतिहासिक तथ्यों को संकलित करने और उनके उजास में वर्तमान को बूझने की कोशिश करता जसवंत सिंह की किताब का अटपटी गलत भाषा और अबूझ किस्म के वाक्यों से भरा हिन्दी अनुवाद भी स्वागतयोग्य है। अलबत्ता यह कहीं इस धारणा को भी पुष्ट करता है कि अंग्रेजी में लिखने वाले हमारे लेखकगण अपनी कृति को हिन्दी के नामी-गिरामी विमोचन विशेषज्ञों से कराके ही संतुष्ट हो जाते हैं। प्रकाशन से पहले अपनी कृति के अनुवाद की बारीक पड़ताल खुद करना जरूरी नहीं समझते। 

जसवंत सिंह की (लगभग अपठनीय ढंग से ठस्स) किताब हमें विश्लेषण के धरातल पर तो कुछ खास नहीं दे पाती। अलबत्ता कुछ रोचक प्रश्न वह अवश्य उठाती है। बड़ा प्रश्न यह है कि अगस्त 1947 को शुरू हुई हिंदू-मुस्लिम विभाजन की यह प्रक्रिया क्या अनंतकाल तक जारी रहेगी, या इसका कोई स्थायी हल हम अपने इतिहास की ईमानदार पड़ताल और चंद बदनुमा सचाइयों की ईमानदार आत्मस्वीकृति की मदद से खोज सकते हैं? यदि अंग्रेजी राज्य में कांग्रेस मुसलमानों को राजनैतिक आरक्षण देने के खिलाफ अड़ जाती तो भी क्या बंटवारा रुक जाता? ..‘विभाजन के बाद बचा हुआ भारत क्या है? क्या हम केवल विभिन्न समुदायों का मात्र एक जमावड़ा हैं? या फिर जैसा जिन्ना ने जरा बेफिक्री..(से) कह दिया..‘कई राष्ट्रों का संग्रह’ हैं? ..जिन्ना की यही तो एक प्रमुख और सतत मांग थी कि चुने हुए निकायों और सरकारी नौकरियों में मुसलमानों के लिए एक तयशुदा प्रतिनिधित्व या हिस्सा पक्का किया जाए।..’

पर आह, तथ्यों या भाषा या पठनीयता के धरातल पर संघ परिवार जसवंत सिंह की किताब का विरोध नहीं कर रहा। करता तो वह शायद कहीं अधिक सही और समर्थन योग्य होता। स्व. राजेन्द्र माथुर के शब्दों में संघ के लोग..‘जन्मभूमि-मंदिर की ऊंचाई को हिंदुस्तान की ऊंचाई और गर्भगृह की नींव को भारत की नींव..’ मानने वाले लोग हैं, जो भारत के ताकतवर राष्ट्र बनने की राह में इस्लाम को सबसे बड़ी बाधा मानते हैं। लिहाजा साहित्य के रस शास्त्र या कलापक्ष पर वे नहीं जाते। इस्लाम के नाम पर अलग राष्ट्र के गठन के पैरोकार जिन्ना पर कोई भी सकारात्मक ब्योरा (तथ्यपरक रूप से वह पुष्ट हो तब भी) उनके अंदर मितली ला देता है। इसीलिए उनकी सांस्कृतिक विचारधारा और राजनैतिक संस्कृति भंगुर हैं, और किताब पर उठा ताजा विवाद उसे और भी क्षणभंगुर प्रतिपादित कर रहा है। जिस हिन्दू सांस्कृतिक चश्मे से वे भारतीय इतिहास तथा संस्कृति को देखते और लिपिबद्ध करते आए हैं, वह लगता है उम्र के मोतियाबिंद से जुड़ कर सरस साहित्यिक समीक्षा और ईमानदार राजनैतिक विश्लेषण दोनों के लिए कतई अयोग्य बन चुका है।

कठोर अनुशासन के समर्थक शास्त्रीय संघ परिवारी समय-समय पर कहते रहते हैं कि जहां पार्टी की तानाशाही है, वहीं सच्च जनतंत्र भी है। इसलिए पार्टी अध्यक्ष (अयोध्या प्रकरण की ही तरह) एक बार फिर मित्र के लिए शोकाकुल होते हुए भी जसवंत के निष्कासन पर सहमत हो गए हैं। लेकिन अपने अन्तर्द्वद्वों और जसवंत सिंह के उठाए बुनियादी सवालों से उन्हें तथा पार्टी को साक्षात्कार कभी न कभी करना ही होगा। वर्ना जसवंत सिंह के निष्कासन और इस किताब पर प्रतिबंध लगाने से भी पार्टी की सांस्कृतिक चेतना का विस्तार या अध्यक्ष पद के निरापद बने रहने की संभावना बहुत कम है।

 

 

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