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बीमार न बना दे सजना

बीमार न बना दे सजना

वन्या मेहता की उम्र है 17 साल। पीठ पर खुजली और जलन की शिकायत होने लगी, तो सोचा कि गर्मी के कारण है। घरेलू नुस्खे आजमाए, लेकिन मर्ज बढ़ता ही गया। मम्मी जबरदस्ती दिल्ली के जाने-माने स्किन स्पेशलिस्ट डॉ. अनिल गंजू के पास ले गईं। डॉक्टर ने मुआयना करते ही दो-टूक लफ्जों में पूछा, ‘क्या वैक्सिंग करवाई है?’ किशोरी ने हामी भर दी। डॉ. अनिल गंजू ने समझया, ‘तुम्हारी त्वचा अभी बेहद नाजुक है। इसलिए भूल कर भी वैक्सिंग के चक्कर में मत पड़ना।’ब्यूटी कांटेस्ट में उतरने की हसरत या ब्वॉय / गर्लफ्रेंड को प्रभावित करने की कोशिश में किशोर-किशोरियां तमाम स्किन ट्रीटमेंट की जायज उम्र तक इंतजार करने के मूड में नहीं लगते। सोलह साल की शिवानी कपूर 14 साल की उम्र से हेयर रिमूवल लेजर ट्रीटमेंट करवा रही है। खुशी-खुशी गर्व से कहती है, ‘ट्रीटमेंट ने मेरी लुक्स को जबरदस्त निखारा है।’ जगजाहिर है कि बच्चों के जिस्म में वयस्क कैद हो गए हैं। अपनी लुक्स को निहारने-संवारने के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं। अपनी उम्र से कहीं ज्यादा बड़े लगने लगे हैं। तमाम मनोचिकित्सक एक मत हैं कि आज के किशोर और युवा 45 साल के होते-होते शर्तिया बचपन की उम्र में लौटना चाहेंगे जिससे वे वंचित रहे हैं।

तस्वीर का दूसरा पहलू देखिए-युवाओं और किशोरों में खूबसूरत दिखने और महसूस करने की ललक इस कदर हावी है कि आज ब्यूटी क्लिनिकों के हवाले बुजुर्ग आंटियों की जगह किशोरियों ने ले ली है। आंकड़े गवाह है कि कास्मेटिक सजर्री और ब्यूटी क्लिनिकों की सेवाएं लेने वालों में 20 फीसदी से ज्यादा की आयु सीमा 12 से16 साल है। बीते चार-छह सालों में ऐसा ट्रेंड तेजी से फैला है। शायद इसलिए कि ज्यादा से ज्यादा नौजवान टीवी और मॉडलिंग की ओर रुख कर रहे हैं। फैशन सलाहकार और ग्रूमिंग एक्सपर्ट बताते हैं कि 12 साल तक के बच्चे ट्रीटमेंट करवाने आ रहे हैं। सभी की मॉडल बनने की तमन्ना है। कभी-कभी पैरेंट्स भी साथ आते हैं, तो कभी-कभार स्कूल से सीधे अकेले भी आ जाते हैं। ऐसों को स्कूली पढ़ाई पर ध्यान केंद्रित करने और कुछ सालों बाद आने की हिदायत बेअसर रहती है।

शायद लगता है कि आज की नौजवान पीढ़ी कुदरती खूबसूरती और काया से कतई खुश नहीं है। चाहती है एकदम बांका दिखना और हरदम फिट। और फिर तमाम ब्रांड्स, सैलून्स और जिम किशोर-युवाओं को लुभावने में जुटे हैं। खरीददारी में बड़े-बुजुर्गो के साथ-साथ बच्चे, किशोर और युवा भी पीछे नहीं हैं। सैलून और जिम से लेकर गारमेंट और ज्वेलरी तक में नए उभरे युवा-किशोर खरीददारी के लिए बाजार में उतर चुके हैं। मुंबई में तो नन्हे-मुन्नों के लिए अलग-अलग सैलून खुले हैं। एक है ‘वॉटरमैलन’ और दूसरा ‘टीयर्स टु चीयर्स’। ‘टीयर्स टु चीयर्स’ की मालकिन तृप्ति आर्य ने एक प्रेस इंटरव्यू में बताया, ‘मैंने अमेरिका में ऐसे सैलून देखे थे। सो, हू-ब-हू मुंबई में पेश कर दिया। लड़के-लड़कियों के लिए हेयर कटिंग के अलावा खासतौर से बच्चों के लिए मेनीक्योर और पेडिक्योर का इंतजाम है।’ तृप्ति ने बताया, ‘दूसरे सैलूनों से अलग हट कर, हमारे यहां बच्चों के हाथ और पांव भली-भांति धोते हैं और फिर नाखून काटते हैं। बस। यानी वयस्कों के सैलून में होने वाली ट्रीटमेंट से एकदम भिन्न तरीका और सरल तरीका है।’

देखा-देखी देश के सभी महानगरों में किशोरों के लिए खासमखास सैलून बनने और खुलने का सिलिसिला चल निकला है। दिल्ली यूनिवर्सिटी के नार्थ कैम्पस से सटी कमला नगर मार्केट में ही, हाल में दो टैटू मैकिंग स्टूडियोज चालू हुए हैं। अकेले 12 से 16 साल के आयु वर्ग के किशोरों का टेक्नो बाजार करीब 15,000 करोड़ रुपए सालाना पार कर चुका है। जबकि कपड़ों-पोशाकों का शादी बाजार 1600 करोड़ रुपए है। दोनों 25-30 फीसदी सालाना की दर से वृद्धि कर रहे हैं।

किशोर और युवा जिम में घंटों कसरत करते नहीं थकते। मुंबई समेत कई मेट्रो शहरों में बच्चों के लिए खास जिम खुले हैं। फिटनेस एक्सपर्ट लीना मोगरे का मानना है कि खेल के मैदानों और पार्को के अभाव के चलते किशोर खेलने-कूदने से वंचित रह जाते हैं। इसलिए जिमों की बदौलत फिटनेस मंत्र सिर चढ़ कर बोलने लगा है। लेकिन किशोरों का जिम में कसरत करना सेहत के लिए उल्टा नुकसानदायक साबित होता है। इसलिए आर्थोपेडिक सजर्नों की सलाह है कि किशोर का शरीर कसरत से उत्पन्न बदलावों को सहन करने में सक्षम नहीं होता। नतीजतन मांसपेशियां फटने और अंदरूनी चोट लगने का भय बरकरार रहता है। हड्डियों की बनावट भी खराब हो सकती है। अत: किशोरों  को कुदरती व्यायाम ही करने चाहिए। लेकिन किशोर मानते कहां हैं?

जिम और कॉस्मेटिक सजर्री ही नहीं, स्पा और सैलूनों की ओर किशोरों-युवाओं का रुख भी हर्ज कर रहा है। अंदाजा है कि ज्यादातर स्पाओं में 20 फीसदी किशोर और बच्चे आते हैं। मोटा अनुमान है कि देश की 48 करोड़ आबादी 20 साल से कम उम्र की और 30 करोड़ 15 साल से नीचे है। देश का सौन्दर्य बाजार 8,000 करोड़ रुपए है जिसमें 12 से 16 साल के बच्चों-किशोरों का बाजार फिलहाल 150 करोड़ रुपए का ही है। ब्यूटी प्रोडक्ट्स, कलर कॉस्मेटिक्स और फ्रेग्नेंस के सहारे बाजार तेजी से पनप रहा है। बच्चे अपनी उम्र से पहले किशोर और फिर युवा हो रहे हैं। अक्सर 15-16 साल के किशोर-किशोरी अस्पतालों में प्लास्टिक सजर्री के लिए उमड़ते हैं। और डॉक्टर कच्ची उम्र में शौकिया सजर्री करने से साफ इंकार कर देते हैं। कुछ किशोर-किशोरियां तो कॉस्मेटिक क्लिनिक्स में अपने प्रिय हीरो या हीरोइन की फोटो लेकर आते हैं और हू-ब-हू नाक तराशने की फरमाइश करते हैं। कुछ तो अपनी मम्मियों को रजामंद करके साथ लाते हैं। तय है कि संग आई मम्मियां अपने बच्चों को समझने-बुझने में नाकाम रहती हैं। आइटम गर्ल राखी सावंत खुलासा करती हैं, ‘जब मैं ब्रेस्ट इमप्लांट करवाने कॉस्मेटिक सजर्न के क्लिनिक में दाखिल हुई, तो हक्की-बक्की रह गई, मैंने देखा कि 17-18 साल की लड़कियां इमप्लांट के लिए इंतजार कर रही हैं।’

मनोवैज्ञानिक आगाह करते हैं कि पैरेंट्स को किशोरों की हर फरमाइश नहीं माननी चाहिए। ज्यादातर अभिभावक नफा-नुकसान को पूरी तरह समझे बगैर रजामंद हो जाते हैं। सजर्री वजन घटाने की कसरत और डाइट का विकल्प हरगिज नहीं है। ट्रीटमेंट करवाने से फायदे की बजाए उल्टा नुकसान होने का अंदेशा रहता है। गौरतलब है कि अगर किशोरों और युवाओं के  सामने आज पैरेंट्स लाचार खड़े हैं, तो कॉस्मेटिक सजर्नों को इंकार का लाल झंडा उठा लेना चाहिए। और किशोर उम्र में ऐसी सजर्रियां और ट्रीटमेंट करने से साफतौर पर इंकार कर देना चाहिए।

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