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अथ दूध-महिमा

अथ दूध-महिमा

भारतीय मन दूध में ऐसा रमता है, कि प्रभु का स्मरण भी ‘दूध-पूत-अन्न-धन लछिमी’ के दाता के ही रूप में करता आया है। आर्य संस्कृति मूलत: गोपालकों की संस्कृति थी, जिसमें दूध का केन्द्रीय महत्व था। यूँ तो सिंधु घाटी की मोहरों पर पुष्ट कूबड़ वाले साँड के चित्र से जाहिर है कि आर्याे के पहले भी गो-वंश पूजा जाता था। (उन मोहरों पर चित्रित साँडों के वंशज आज भी उनकी ‘कँकरेजी’ जाति के रूप में देखे जा सकते हैं) पर आर्यो का शुरुआती साहित्य और वैदिक कर्मकाण्ड गायों और दूध के उल्लेखों तथा प्रयोग से भरपूर हैं। हिन्दू धर्म के रूढ़िवाद के खिलाफ बगावत कर बाद में जब बौद्ध और जैन धर्म के प्रवर्तक हिन्दू धर्म से बाहर हुए, तो भी उनके अनुयायियों के बीच दूध और दूध के उत्पादों का महत्व बना रहा। अन्तर बस यह आया कि जैन लोग दूध को मलमल से छान कर प्रयोग में लाने लगे। आज भी जैन समुदाय में ‘खोला’ का यदाकदा प्रयोग होता है। खोला या साफ मलमल के टुकड़े को दूध में भिगो कर सुखा लेना, और बाद को जरूरत के मुताबिक पानी में भिगो कर उस द्रव्य का प्रयोग करना।

रेफ्रीजरेटर के आगमन के बाद दूध को फटने से बचाए रखने का सरदर्द मिट गया है, और शहर-शहर डेरियाँ खुल जाने से दूध, क्रीम, खोया, पनीर, घी खूब इफरात से उपलब्ध है। दाम अलबत्ता पहले से कई गुना बढ़ चुके हैं। अँग्रेजी शैली से बिना गाढ़ा किए दूध से क्रीम निकालने वाली मशीन मुम्बई में 1890 में अंग्रेज लाए। उनकी डेरियों में बनाया क्रीम ब्रिटिश छावनियों तथा क्लबों तथा लोकल अंग्रेज के परिवारों में बिकता था। 1947 तक भारत में 10,000 टन क्रीम उत्पादन होने लगा था, पर इसका ज्यादातर हिस्सा घी बनाने के देसी काम में ही आता था। हमारे घरों की रसाइयों में दादी-नानी या माँ द्वारा मलाई ‘मार के’ प्रिय जन को अलग से दूध का गिलास थमाना या चाय या लस्सी बनाते हुए उसमें मलाई का थक्का डालना भोजनभट्टों के लिए चाहे जितना महत्व रखता हो, दूध की मलाई या क्रीम का भारतीय रसोई में वह केन्द्रीय महत्व नहीं है, जो कि घी का। संस्कृत में मलाई को ‘सतनिका’ कहा गया है, और तमिल में इसे ‘एडु’ या ‘पेरुगु’ कहा जाता है। व्हेनसांग ने उल्लेख किया है कि (7वीं सदी में) नालन्दा में अतिथियों को भोजन में मलाई दी जाती थी। और मध्य एशिया के तुर्क भी अतिथियों को किशमिश, चीनी और भात के गोलों में मिला कर ‘दूध-भात’ खिलाते थे। उत्तर पश्चिमी भारत में मलाई खासतौर से धीमी आँच पर दूध पका कर बनती है, और ‘खुरचन’ या मलाई के लड्डुओं के रूप में बेची जाती है।

दूध से खोया बनाना भी दूध का संरक्षण करने में काम आता है। दूध को गाढ़ा करने की प्रक्रिया को हलवाई ‘कुन्दा करना’ कहते हैं। उत्तराखण्ड में आज भी खोए का ‘कुन्दा’ नाम ही प्रचलित है। धार्मिक दृष्टि से दूध के उत्पादक के रूप में माँ के बाद हमारे यहाँ गाय का भले ही बड़ा महत्व हो, पर भैंस, बकरी, भेड़ तथा (राजस्थान में) ऊँटनी का दूध भी श्वेतक्रांति का जरूरी हिस्सा रहे हैं। सुश्रुत संहिता में तो कई जड़ी बूटियाँ इन्हीं के दूध से खाने का निर्देश है। शुद्ध दूध को आयुर्वेद में मीठा, भारी, शीतलताकारक और वसाप्रधान माना गया है। यह बलवर्धक है, और अच्छी नींद दिलाता है। ताजा दुहा गर्मागर्म दूध ‘धारोष्ण’ कहलाता है। माना जाता है वह अग्नि का वीर्य धारण किए होता है, इसलिए पूर्णत: पवित्र है और बिना उबाले भी धार्मिक कृत्यों में इस्तेमाल हो सकता है। घी को भी हर अवस्था में पवित्र माना जाता है। और माना जाता है कि घी मिला कर कच्च चावल भी परम पवित्र बनाया जा सकता है। पितरों के पिण्डदान के लिए ऐसे ही चावलों का भात बनाते हैं। मानते हैं कि उफना कर आग में गिरा दूध अग्नि को अर्पित होता है। इसलिए दक्षिण भारत में दूध उफनाना शुभ समझ जाता है।

दूध सबको पवित्र करने वाली अग्नि का बीज धारण करने के कारण पवित्रतम खाद्य पदार्थो में गिना जाता है, दुग्धान्न (खीर या दूध भात) के प्रकार हर किसी के साथ बाँट कर नहीं खाए जाते और दूध तथा दूध के उत्पाद व्रत के दौरान भी खाए जा सकते हैं। पक्व (पकी हुई) और अपक्व (बिना पकी) दोनों तरह की रसोइयों में दूध महाराज की एण्ट्री बेरोकटोक होती है। और देवताओं, पितरों तथा परमपूज्य अतिथियों को भेंट किए जाने वाले दो प्रकार के पवित्र घोलों : मधुपर्क तथा पंचगव्य, दूध तथा दूध के उत्पादों से ही बनते हैं। बच्चे को भी अन्नप्राशन के वक्त दूध की ही खीर चटा कर उसकी रसना को अन्न के साथ इण्ट्रोड्यूस कराया जाता है।

वैदिक काल में दूध भोजन का अनिवार्य हिस्सा होता था। जेवनार के दौरान दूध तथा दही में भिगोए बड़े (वटक) परोसे जाने का जिक्र भी ‘अपभ्रंशस्त्रयी’ में आता है। दक्षिण भारत में भात के भपाए गए व्यंजन ‘अप्पम’ को मीठे दूध के साथ परोसा जाता रहा है। इसे ‘पेरुपनुरु’ कहते हैं। लक्ष्मीश के कन्नड़ ग्रंथ (18वीं सदी) जामिनी भरत में दही के रायते (पचडी) का भी उल्लेख है। दूध के बने मीठे पदार्थो में पायस (खीर) किसी न किसी रूप ने दस हजार ब्राह्मणों को भात और खीर खिलाकर तृप्त किया था। मुसलमानों में भी शीर खोरमा और दूध की सेंवई त्योहारों का अभिन्न भाग है। इब्नबतूता (13वीं सदी) ने ‘श्यामक’ (सावाँ) चावलों में पूरे भारत का प्रिय डिश है। महाभारत में उल्लेख है कि युधिष्ठिर की खीर के अनिर्वचनीय स्वाद का लंबा विवरण किया है, जो उसने भारत यात्र के दौरान चखी। राजस्थान में मोटे अन्न को दूध में आज भी कई तरह से पकाया जाता है और मालवा में भुट्टे के दूधिया दानों को।

गेहूँ की रोटियों तथा पूड़ियों का स्वाद बढ़ाने को प्राय: आटा दूध या दही में गूंथा जाता है। मुसलमान नानबाई दूध गुंथे आटे से एक बड़ी स्वादिष्ट रोटी ‘शीरमाल’ बनाते हैं। दूध के उत्पाद : दही, पनीर, छाछ और घी के बिना भारत में किसी भी जाति-सम्प्रदाय की रसोई सूनी मानी जाती है। 18वीं सदी तक उत्तर के चटोरों की भारी पसन्द रबड़ी रानी दक्षिण भी जा पहुँची थीं। ‘सौन्दर्य विलास’ ग्रंथ में उसे केने-पायस कहा गया है। बंगाल में चण्डी मंगल तथा चण्डीदास पदावली दूध और दूध की मिठाइयों  के गुणगान से भरे पड़े हैं। मजे की बात यह है कि बंगाल में 17वीं सदी तक दूध की मिठाई नहीं अन्न की ही मिठाइयाँ बनती थीं।  18वीं सदी से दूध, यानी खोए और छेने की मिठाइयाँ बननी शुरू हुईं। जमीदारों तथा अंग्रेजों ने भी नए प्रयोगों को प्रोत्साहित किया। लॉर्ड कैनिंग की पत्नी का नाम ‘लेडी कैनिंग’ (छेने का गुलाबजामुन) से जुड़ कर अमर हुआ।

दूध हमारे यहाँ की जलवायु में अधिक टिकता नहीं, इसलिए दही के बैक्टीरिया आर्यवरों के लिए महाउपयोगी बने। दही, दधि, मट्ठा (तक्र) को भी नाना प्रकार से भारतीय रसोइयों में जगह मिली। पूरी के साथ श्रीखण्ड तो 400 सदी ई.पू. ही खाया जाने लगा था। कृष्ण की माखनचोर लीलाओं से जुड़ कर दूध-दही- मक्खन घर-आँगन से होते हुए मंदिरों तक जा पहुँचे और सुकवि ‘रसखान’ ने प्रमुदित होकर गाया कि तीनों लोकों के मालिक दूध-दही मक्खन के घनघोर प्रेमी कृष्ण को दुग्धपालक अहीरों की छोरियाँ कैसे ‘छछिया भर छाछ’ पर नचाती रहीं।

‘दूध का मोल चुकाना’, ‘दूध को लजाना’, ‘छठी का दूध याद दिला देना’ जैसे मुहावरों से माँ के दूध को महिमामंडित करने वाले देश में 20वीं सदी में केरल के कुरियन लाए श्वेत क्रांति और वह सीधे ‘अमूल’ के पाउच तक जा पहुँची। ‘दूध की महिमा अनन्त और दूध-कथाएं सचमुच अनन्ता हैं।’

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