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बड़े शहरों को बचाना क्यों जरूरी है

यह लेख हिन्दी के कतिपय ‘अहा-ग्राम्य-जीवन-भी-क्या है- वाद से पीड़ित महानगरीय लिक्खाड़ों द्वारा पतनशील पूजीवाद काप्रतीक कहकर बड़े शहरों के पतन पर हर्षध्वनि करने के खिलाफ लिखा गया है। खुद महानगरों की हर सुविधा का भरपूर उपभोग करते हुए भी (शंकालु शोधार्थी तनिक उनकी कारों का आकार, ब्राण्ड और उनकी स्थावर-जंगम सम्पत्ति पर ईमानदारनजरें दौड़ा लें) वे धोती कस कर यह प्रतिपादित करने में जुटे हुए हैं, कि बड़े शहरों के विनाश और ग्रामों के उत्थान के बिना‘सादा जीवन उच्च विचार’ का मंत्र साकार नहीं किया जा सकेगा। बड़े शहरों का मुनाफाखोर मीडिया, वहा की पतनशील संस्कृति (जिसके एकाधिक मंचों पर वे व्याख्यान देने न्योते जाते रहे हैं), सम्पन्न मध्यवर्गीय उपभोक्ता और उनकी आकांक्षाएं (जो कहीं न कहीं उनके अपने परिवारजन भी धारण किए हैं) सब उन्हें सतत कलपाते हैं। वामदलों तथा समाजवादियों के गहरे क्षरण के बाद यह विचार जरूर कष्टकर है, कि पूजीवाद की सार्वभौमिकता की इस घड़ी में देश के आगे पूजीवाद के खतरों के बढ़ने कीस्थिति में कोई स्वस्थ विकल्प नहीं बच रहा। कांग्रेस की ही तरह पूजीवाद को भी ‘टीना’ तत्व (देयर इज नो ऑल्टरनेटिव- कोई विकल्प नहीं है) का ही भरपूर लाभ मिल रहा है। पर इस पर रोते रहने से फायदा क्या? लोकतंत्र में पूजीवाद के भीतर उपजे विषों को विरेचन करने की नेताओं की एक मजबूरी होती है। और इधर उसी के चलते संप्रग ने अपनी प्राथमिकताए, कार्यशली और बजटीय आवंटनों में कई बुनियादी बदलाव भी कर लिए हैं। जरूरत यह है कि ऐसे ही सुधार बड़े शहरों और उनकी संरचना के संदर्भ में भी किए जाएं।
संकट बेशक गहरा है। शहरों में अगर उसकी फुनगिया ढाचागत दोषों और शहरी निकायों के भ्रष्टाचार में दिखती हैं, तो वैसे ही हमें गावों में भी खाप-पंचायतों की बर्बर जकड़बंदी और पंचायती निकायों में नरेगा जैसी सरकारी योजनाओं की मार्फत उपजे भ्रष्टाचार के नए स्वरूपों में उसके दर्शन होते हैं। सच तो यह है कि हमारी ग्रामीण युवाओं के लगातार शहरों की ओर पलायन से देश की आबादी का अनुपात शहरों और गावों में आधा आधा बटने के करीब पहुच चुका है। शहरी युवा भले ही ग्राम्य जीवन को लेकर रुमानी सपने पाले हुए हों, गावों का युवा गावों से निराश होकर जल्द से जल्द बड़े शहरों की ओर भागने का इच्छुक है, जहां उसे समृद्धि और बेहतर भविष्य के बड़े स्रोत नजर आते हैं। और ठीक ही आते हैं। देश के बीस सबसे बड़े महानगर, जिनमें फिलवक्त देश की आबादी का कुल 10 प्रतिशत हिस्सा रहता है, देश की कुल कमाई का 30 प्रतिशत भाग पैदा कर रहे हैं। और देश में खर्च की जाने वाली राशि का 21 प्रतिशत भी इन्हीं शहरों के उपभोक्ताओं की जेब से निकल रहा है। नेशनल काउंसिल फॉर अप्लाइड इकनॉमिक रिसर्च के सालाना शहरी सर्वेक्षण के अनुसार महानगरों के परिवारों में 51 प्रतिशत परिवारों में कम से कम एक सदस्य ग्रेजुएट है, 49 प्रतिशत सदस्य नौकरीपेशा हैं तथा 32 प्रतिशत अपने उद्योग चला रहे हैं। गावों में सिर्फ 10 प्रतिशत लोग ही नौकरीपेशा हैं और गैरकृषि क्षेत्र के सिर्फ 11 प्रतिशत लोग ही सही अर्थ में स्वरोजगारी हैं। बीस बड़े शहरों में अशिक्षित कामगारों की कमाई (70 हजार रु. प्रतिवर्ष) भी हमारे गावों के अशिक्षित कामगरों की कमाई (22,500 रु.) से कहीं ज्यादह है। महानगरों, पूजीवाद और उपभोक्तावाद के कटु आलोचकों की निन्दा का अन्य मुद्दा यह है कि शहरों में गरीब-अमीर के बीच का फासला बेहद बड़ा होता है। पर हमारे गावों में भी गरीब-अमीर के बीच की दूरिया शहरों से कम नहीं। बड़े शहरों में शीर्ष पर खड़े परिवार 3,01,734 रु. प्रतिवर्ष कमाते हैं, और सबसे निचले स्तर पर खड़े लोग 43,878रु., जबकि गावों के अमीर 1,35,936रु. प्रतिवर्ष कमाते हैं और ग्रामीण गरीब सिर्फ 19,536 रु. प्रतिवर्ष। फासले वही, सिर्फ कमाई फर्क है।
महानगर और उनकी संस्कृति बने कैसे? यह पाश्चात्य संस्कृति का असर नहीं। 1947 से पहले अंग्रेजों ने भारत में बड़ी-बड़ी प्रेसिडेंसिया कायम की थीं और उसमें अपनी जरूरतों की तहत उन्होंने जति और भाषा समूह विशेष के लोगों को नौकरियॉं देकर युवकों की महत्वाकांक्षा के साथ जतीय अहंकार को पोसा। इससे कायम अलगाववाद तथा भेदभाव को आजादी के बाद क्षेत्रीय नेताओं तथा आरक्षण की राजनीति ने भी अपने स्वार्थो की तहत लगातार स्वदेशी सान दी। उधर नई अर्थनीति के दबावों से वर्ण व्यवस्था टूटी लेकिन वर्गव्यवस्था बढ़ी। कुल मिलाकर आजादी के बाद के महानगर और बड़े शहर (चण्डीगढ़, फरीदाबाद या राची) हमारी सामाजिक राजनैतिक प्राथमिकताओं के दबावों से ही बने हैं। पूजीवाद के पतनशील ठिकाने और वहॉं के (पूरे देश की अर्थव्यवस्था को भरपूर खाद-पानी दे रहे) उपक्रमों को शतानी ताकतें करार दे कर उनके विनाश की गति तेज करने के लिए आंदोलन की माग उठाना एक भावुक और आत्मघाती तेवर है। यह देगा तो कुछ नहीं, पर चंद सिरफिरों से तोड़फोड़ करवा कर हमें सामाजिक आर्थिक मलबे का मालिक बना कर उसी अंधेरिया मोड़ पर छोड़ आएगा जहा हम सौ साल पहले खड़े थे। आज का बंगाल इसका ज्वलंत उदाहरण है। शहरी शोषण पूंजीवादी है पर उत्पादक और प्रगतिशील भी है, जबकि ग्रामीण शोषण आज भी अनुत्पादक, उपभोगवादी और प्रतिगामी है। देश के दो समृद्धतम राज्यों: गुजरात और हरियाणा के गॉंवों में खाप-पंचायतों तथा सांप्रदायिक दलों के विस्मयकारी रूप से हिंसक और गैरकानूनी फरमान और कन्याओं की भ्रूण हत्या भीषण रूप से बड़ी तादाद इसका प्रमाण हैं।
भारत की तीन चौथाई से अधिक युवा आबादी शहरों को तरक्की करते देखा है, और वह उसका जल्द से जल्द एक हिस्सा बनना चाहती है। गॉंवों में उसका सचमुच में दिल लगता, तो शायद खाप पंचायतों के खिलाफ पंचायती भ्रष्टाचार तथा सरकारी
दखल के खिलाफ, जतिवाद के खिलाफ, बड़े आंदोलन गॉंवों में उठते। पर आप यहॉं से वहॉं तक देख लीजिए, प्रताड़ित गॉंवों में सन्नाटा है। सामाजिक आर्थिक बुराइयों के खिलाफ जो आंदोलन उठ भी रहे हैं, शहरी मध्यवर्ग के बीच से ही। गॉंव का प्रेमीयुगल तक खाप से त्रस्त हो कर शहरी थाने में ही गुहार करता है। इसलिए भारत में अब चयन का जो द्वन्द्व शहरों गॉंवों के सन्दर्भ में होना है, वह उसी द्वन्द्व की अनुकृति होगा जैसा कांग्रेस और गैरकांग्रेसी क्षेत्रीयदलों के बीच हुआ। कांग्रेस की केन्द्रीय प्रवृत्ति और वंशवाद के विरुद्ध क्षेत्रीय दलों ने जब विद्रोह का झंडा उठाया तो विभिन्न युतियॉं बना कर व्यक्ति की बजाएसंस्थामुखी और दिल्ली की बजाए विकेन्द्रित राजनीति का एक विकल्प लोगों के सामने रखा। इस पर वे चुनाव जीते भी। पर मध्यावधि में जब यह विकल्प उद्दाम, बेलगाम क्षेत्रीयता और जतिवादी हिंसा और भ्रष्टाचार के दलदल में फॅंस कर ठप्प हो रहा तो उस टूटन, बिखराव और रात-दिन की चेंपें से खिन्न जनता ने एक बार फिर शनै: शनै: कांग्रेस की ओर रुख कर लिया। आज हमारे गॉंवों के युवा का भी ग्रामीण विकल्पों से मोहभंग हो चुका है। और वह भाग रहा है उधर, जहॉं इक्कीसवीं सदी के सूचना राजपथ और अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक तंत्र से जुड़े बड़े शहर हैं। अब शहरों के आगे चुनौती है इन करोड़ों युवाओं के सपनों के ज्वार को ठीक से आत्मसात करना। ऐसा ज्वार ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन या नरेगा से ही तुष्ट नहीं होगा। इसके लिए सरकार को शहरों की ढॉंचागत और प्रशासनिक बेहतरी के बारे में भी बिना ग्लानि अनुभव किए जरूरी पूंजी का बंदोबस्त करना हीपड़ेगा। साथ ही उसे छोटे शहरों के विकास के लिए भी समय रहते सही ढॉंचा गठना होगा। एक तेज बारिश, एक राजमार्गीयचक्काजम, एक नये फ्लू का प्रहार अगर देश की समृद्धि के स्रोत बन चुके महानगरों की पूरी आर्थिक और सामाजिक रफ्तार पर ब्रेक लगा दे तो हम क्या खाकर देश में कॉमन वेल्थ खेल कराने और अपनी विकास दर 10 प्रतिशत प्रतिवर्ष तक ले जाने केसपने पाल सकेंगे?

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