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द्रुत झरो जगत के जीर्ण पत्र

(‘डिस्क्लेमर’ : टिप्पणी में आए एक फिल्मी खलनायक के नाम को फिल्मी खलनायक ही समझ जाए।)
हिंदी में ‘अचरज’ दुहर रहा है। बूढ़े जवान हो रहे हैं। जवान बूढ़े। बूढ़े गिद्ध अपने डैने फड़फड़ाते हैं। युवा चिड़े-चिड़िएं उनकी ‘उदारता’ के तले अभय विचरण करने लगते हैं। इस ‘अश्रद्ध’ और ‘अशिष्ट’ समय में श्रद्धा और शिष्टता की ‘उल्टी डायलैक्टिक्स’ चल रही है। अठारह साला युवा अस्सी साला आशीर्वाद के बिना साहित्यिक जीवन दान नहीं प्राप्त कर सकता। जिस तरह पुरानी ब्लैक एंड व्हाइट फिल्मों के क्लब डांस सीन में हेलेन ‘मेरा नाम चिन चिन चूं’ करती और युवा हीरो अशोक कुमार को रिझती थी और अपने दफ्तर में बैठा फिल्मी खलनायक के. एन. सिंह एक आंख छोटी कर अपने मातहत को हीरो को खत्म करने के एक्शन का इशारा करता। वही सीन बार-बार साहित्य में दुहरता है।

फर्क इतना है कि हिंदी साहित्य के के. एन. सिंहों के धुआं भरे जुआघरों में जसूस सीआईडी बने अशोक कुमार की जगह बहुतसारे सिर्फ ‘कुमार’ होते हैं। हेलेन बूढ़ी हो गई हैं, लेकिन खुद को राखी सावंत समझती है। इस महा उत्तर आधुनिक बिंदासी लपेट में युवा रचनाकार की एक अदद ‘प्रोफाइल’ या ‘पटकथा’ लिखने का मन करता है : पुरानी ‘हावड़ा ब्रिज’ या ‘चाइनाटाउन’ या ‘सीआईडी’ टाइप की फिल्मों के सीनों में युवा साहित्य को घटाकर देखा जए! वहां आपको साहित्य का ‘केएन’ फैक्टर मिलेगा! युवाओं को फंसाता, छलता। एक बात जरूर निकलती: अंत में युवा हीरो अपनी मधुबाला को लेकर, केएन फैक्टर कोपीट-पाट कर बाहर निकल ही आता! क्या आज भी ऐसा होता है? आज का युवा लेखक वसा हीरो नहीं। वह उस चूहे की तरहहै, जो बूढ़े गिद्धों के पास साहित्यिक चूहा होने का सर्टिफिकेट लेने जता है। और चोंच में दबोच लिया जता है। चोंच में जाकरवह धन्य समझता है। चलो इतिहास में तो आ गया। इस युवा पीढ़ी का किसी वरिष्ठ पीढ़ी से ‘टकराव’ नहीं, वह अधिकतम एक ‘पीढ़ा’ चाहता है : कुछ दिन केएन फैक्टरी की चौकी के पास पड़ा रहेगा। शायद यह भी पूरा सच नहीं। गिद्ध उस पर यकीननहीं करते। यह चिरौरी भी एक नीति बनती है यहां। बीते कुछ दिनों में युवा पीढ़ी के मन मिजज पर एक राष्ट्रव्यापी सर्वे बताता है कि आज का युवा रूढ़िवाद और निजी आजादी के बीच विभक्त युवा है। साहित्य में इसका प्रतिबिंब मिलता है। युवा साहित्यकारों की बड़ी पीढ़ी किसी भी समाज-संघर्ष और ‘आत्म संघर्ष’ से रहित, मुक्त एक ‘साहित्य-उपभोक्ता’ पीढ़ी है। उसने कोई ‘मठ’ और ‘गढ़’ नहीं तोड़े, बल्कि हर ‘मठ’ और ‘गढ़’ में अपना ‘एडमिशन’ कराने के लिए रास्ते तलाशे हैं! ऐसा युगांतकारी ‘अनुकूलन’ है! इतनी लालची युवा पीढ़ी कब हुई, जो अपने ‘होने’ की सनद अस्सीसाला ‘टायर्ड’ और ‘रिटायर्ड’ लोगों से मांगती फिरे? और गिद्धजन इन ‘लौंडों लपाड़ों’ को ‘लौंडे लपाड़े’ कहें और सब फिल्ल से हंस पड़ें!
ऐसी अश्लीलता और उससे अधिक निर्लज्ज उसके बरसने का एहसान! इस अखिल 55 करोड़ के युवा जगत में, उनके बीच सेनिकलने वाले सैकड़ों रचनाकारों में एक भी युवक रचनाकार ऐसा क्यों न निकला जो कहता: सरजी! शट अप! बकवास बंद!नहीं चाहिए आपका बदबूदार आशीर्वाद! नहीं चाहिए तुम्हारे इतिहास में कोई जगह! वह सड़ी जगह तुम्हें मुबारक! हर शाम, हर गोष्ठी और वही अभ्यस्त खुर्राट खर्च हो चुके चेहरे। वही अभ्यस्त खेल और फिर अगले दिन वही-वही-वही बकवास!

‘बकवास’! यही साहित्य है! सबसे बड़ा साहित्य। ‘गंभीरता’ के नाम पर यही बचा है! युवा पीढ़ी इसमें आनंदित है। सबसे आत्मसंघर्षकारी समय और उम्र इस ‘बुड़बक’ को माला दुशाला चढ़ाने में खुश है! नहीं, हमारे पचपन करोड़ युवाओं के बिंदासब्लॉग रचनाकारों के आजाद, अपने मार्ग को चिह्न्ति करने वाले, साहसी, निर्णय लेने वाले मिजाज का प्रतिनिधि नहीं है ये युवा रचनाकार। कोई वक्त रहा। एक कवि ने लिखा: ‘द्रुत झरो जगत के जीर्ण पत्र’! आधुनिक काल के सारे परिवर्तन पिछली पीढ़ी से लड़कर, बहस चलाकर आए हैं। प्रेमचंदीय कहानी-जनेंद्रीय कहानी से नई कहानी के कथाकार झगड़े और वैचारिक बहसें चलाईं। नई कहानी कविता वालों से अकविता वाले उलझे। इसी बात को ‘युवा विशेषांक’ वाली गोष्ठी में सारे गिद्ध महाशयों ने ‘अंडर प्ले’ किया जबकि उन सबका करियर ‘विरोध’ से बना। किसी ने न कहा: तुम अगर जवान हो, नए रचनाकार हो तो हम ‘गुजरे जमाने के चेहरों’ के पास क्या लेने आए हो! मुक्तिबोध ने ‘अंधेरे में’ कविता में यही बात नई पीढ़ी को गांधी से कहलवाई है : ‘हम हैं गुजरे जमाने के चेहरे..तू आगे बढ़ ज’। खुर्राट कंजूरों के पास इतना दिल गुर्दा तक नहीं बचा कि इतना भी कह सकते!

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  • Web Title:द्रुत झरो जगत के जीर्ण पत्र