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दुनिया के दिग्गजों की फूलती सांसें

ब्रिटेन के दिग्गज गाजिर्यन मीडिया समूह के अखबार संडे आब्जर्वर की सांसें पिछले दिनों बन्द हो गई। दुनिया के सबसे पुराने जीवित अखबारों में शुमार 218 साल पुराना यह अखबार इस साल 61 मिलियन पाउण्ड का घाटा सह चुका था। ब्रिटेन की अखबारी और ब्रॉडकास्ट इंडस्ट्री पिछले महीनों में दो हजार से भी ज्यादा पत्रकारों को नौकरी से बेदखल कर चुकी है। बेहाल पत्रकारों ने हाउस ऑफ कामन्स की मीडिया कमेटी से गुहार लगाई है कि मीडिया इंडस्ट्री की नैया डुबाने से बचाने की ठोस योजना बनाई जाए। ब्रिटेन में अखबार काफी मंहगे हैं और मुफ्त अखबारों का प्रचलन नहीं है। फिर भी वहां का समाचार संसार मंदी की ऐसी मार सह रहा है जिससे उबरने की कोई सूरत उन्हें नजर नहीं आ रही। प्रतिष्ठित गाजिर्यन समूह इस साल 90 मिलियन पाउंड का घाटा ङोल चुका है। समूह ने खर्चे कम करने के लिए सम्पादकीय कामकाज के तौर तरीकों को नई तरह से व्यवस्थित किया है। अपनी साइट और दोनों अखबारों यानी गाजिर्यन और आब्जर्वर के सम्पादकीय विभागों को मिलाकर बनाई गई टीम को अलग अलग जिम्मेदारियां सौंपी गईं हैं। इन्हें अब अखबार और साइट के लिए लिखित कॉपी के साथ ही आडियो विजुअल स्टोरी भी करनी होगी। इस बदलाव के बाद उपजे अहम के टकराव के बाद करीब तीन दर्जन पत्रकारों ने स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ले ली है। एबीसी की रिपोर्ट के मुताबिक ब्रिटेन के 11 राष्ट्रीय दैनिक अखबारों में से डेली स्टार को छोड़कर सारे अखबारों की प्रसार संख्या एक से बीस फीसदी तक घट गई है।
अमेरिकन सोसाइटी ऑफ न्यूजपेपर्स के सर्वे के मुताबिक वहां के दैनिक अखबार पिछले साल करीब छह हजार नौकरियों पर तलवार चला चुके हैं। साल की शुरूआत में अमेरिका का न्यूयार्क टाइम्स दीवालिया होने के कगार पर था। इस समूह की न्यू इंग्लैंड मीडिया ग्रुप इकाई और उसका करीब 137 साल पुराना अखबार बोस्टन ग्लोब भी बिकने को तैयार है। द ट्रिब्यून ने भी हाथ खड़े कर दिए हैं। अन्य स्थानीय अखबार भी या तो दीवालिया हो गए हैं या उनका हाल बेहाल है। विज्ञापन आय 18 फीसदी घट गई है और आने वाले समय में इससे दुगनी गिरावट की आशंका जाहिर की गई है। फाइनेंशियल टाइम्स में प्रकाशित एक सीरीज में रिपोर्टो के हवाले से सचेत किया गया है कि आने वाला साल प्रकाशन व्यवसाय के लिए सबसे खराब होगा। हो सकता है कि डूबने से बचने के लिए अखबारों को अपनी प्रतियां पचास फीसदी तक घटानी पड़े। विकल्प के तौर पर अखबारों को मुद्रित कॉपी का मोह छोड़कर केवल ऑनलाइन संस्करणों में भी तब्दील होना पड़ सकता है। उधर स्कॉटलैंड केअखबारों को सरकारी विज्ञापन मिलना बन्द हो गए हैं क्योंकि सरकार को लगता है कि ऑनलाइन विज्ञापन का प्रसार ज्यादाहै। ऐसे में वहां के अखबारों ने इस दौर में करीब दस मिलियन पाउंड का नुकसान सहा है। वे भी सरकार से गुजारिश कर रहे हैं कि बुरे वक्त में सरकार ठोस कदम उठाकर उनका साथ दे।

मुफ्त ऑनलाइन खबरों ने भी अखबारों की बिक्री पर असर डाला है। एबीसी की रिपोर्ट के मुताबिक पिछले साल ब्रिटेन मेंकरीब साढ़े तीन लाख लोगों ने अखबार पढ़ना बन्द कर दिया। व्यस्त जिन्दगी और महंगे अखबार भी वजह हो सकते हैं। रूपर्ट मडरेक जैसे मीडिया गुरू अपने अखबारों की सांसें बचाने के लिए रेवेन्यू मॉडल में भारी तब्दीली की पैरोकारी कर रहे है। उन्होंने अपने सभी समाचार प्रतिष्ठानों की ऑनलाइन साइट्स के लिए उपयोगकत्र्ता से पैसा वसूलने की ठान ली है।फाइनेन्शियल टाइम्स ने यह व्यवस्था लागू कर दी है। हालांकि व्यवसाय और विशेषज्ञ ऑनलाइन खबरों और आलेखों के भुगतान के मॉडल की सफलता के बारे में संदेह रखते हैं। इस कदम को आत्मघाती करार दिया जा रहा है। भारत की अखबारी दुनिया का हाल विश्व के अन्य अखबारों से जुदा है। यहां के अखबार फेरबदल में जरूर लगे हैं लेकिन साथ ही बड़े प्रतिष्ठान अपने समूह और संस्करण के फैलाव की तैयारी कर रहे हैं। फिक्की की इंडियन एंटरटेनमेंट एंड मीडिया इंडस्ट्री- सस्टेनिंग ग्रोथ रिपोर्ट 2008 में आने वाले पांच साल में प्रिंट व्यवसाय के अपने आकलन में 14 फीसदी वृद्धि की आशा जताई है। अखबारों की कम कीमत, उनके बेहतर स्वरूप, युवा पाठकों की बढ़ती तादाद जैसे कई कारण हैं जो इंटरनेट के विस्तार के बावजूद अखबार व्यवसाय की अहमियत कायम रखे हैं। हालांकि बड़े प्रतिष्ठानों की ज्यादा मुनाफे और पत्रकारों में सुविधाओं और मोटी तनख्वाह  की बढ़ती चाह के बीच पत्रकारिता की प्रतिष्ठा जरूर दांव पर लगी है। विज्ञापनों पर निर्भरता के बीच जनहित की पत्रकारिता की बलि भी चढ़ रही है। सम्पादकीय संस्थाएं ध्वस्त हो रही हैं। ऐसे में सीमित संसाधनों व खर्चो से चलने वाले छोटे या मुख्यधारा से छिटके अखबार पत्रकारिता के पहरूआ बनकर उभरें तो कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए।

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