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नरेगा को पारदर्शी बनाना बड़ी जरूरत

केंद्र सरकार की सबसे महत्वाकांक्षी योजना का सारा भार उन्हीं के कंधों पर है। इन दिनों संप्रग सरकार जब राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम यानी नरेगा में नई जान फूंकने की तैयारी कर रही है तो केंद्रीय ग्रामीण विकास व पंचायती राज मंत्री सी. पी. जोशी का महत्व और भी बढ़ गया। इन दिनों इस योजना को नया विस्तार देने की तैयारियां जोर-शोर से चल रही हैं। इन्हीं तैयारियों में जुटे सी. पी. जोशी से रू-ब-रू हुए रूही तिवारी और लिज मैथ्यू।

नरेगा के दूसरे चरण के लिए आप क्या कर रहे हैं?
पहला चरण और दूसरा चरण यह सब मीडिया की बाते हैं, हम इस तरह नहीं सोचते। मूल रूप से राष्ट्रपति के अभिभाषण में जो कहा गया था, हम उसी दिशा में प्रयत्न कर रहे हैं। इसके अलावा हम इसमें कनवर्जेस लाएंगे और पारदर्शिता बढ़ाएंगे। हम जवाबदेही की एक व्यवस्था बनाना चाहते हैं, इस पर विभिन्न स्तरों पर बातचीत चल रही है।
यानी मुख्य जोर पारदर्शिता पर रहेगा?
यही सबसे महत्वपूर्ण बात है। लोगों को पता होना चाहिए कि पैसा कहां खर्च हो रहा है। जो गरीब लोग इसके मातहत काम कर रहे हैं उन्हें पैसा मिलना चाहिए, लेकिन इसके विपरीत उनके पैसे काबिज हो जाते हैं।
क्या आपको लगता है कि नरेगा का फोकस बदल रहा है। यह रोजगार पैदा करने वाली योजना बन कर रह गई है?
जो लोग गांवों में नहीं रहे हैं या वहां की समस्याओं को नहीं जानते हैं, वही ऐसा सोचते हैं। लोग कहते हैं कि इससे आप विकास क्यों नहीं करते। लेकिन विकास एकदम अलग जरूरत है और उस जरूरत को पूरा करने का तरीका एकदम अलग है। मूल रूप से यह कानून उन गरीबों के लिए हैं, जिनके पास कोई कुशलता नहीं है। अब हमें धीरे-धीरे अर्धकुशलता से कुशलता की ओर बढ़ना है। इस काम को कैसे करना है, इस पर विचार कर रहे हैं।
नरेगा की एक आलोचना यह है कि इसमें संपत्ति का निर्माण काफी सीमित होता है। इसका समाधान कैसे करेंगे?
संपत्ति का निर्माण एक बात है। इसके तहत हमने अनुसूचित जाति और जनजाति के लोगों को खुद उन्हीं के खेतों में काम करने की इजाजत दी है। अब हम इसे छोटे और सीमांत किसानों तक ले जा रहे हैं। इससे हम कृषि की उत्पादकता बढ़ा सकते हैं।
नरेगा की वजह से दूसरे क्षेत्रों में मजदूरों की समस्या आ रही है?
अगर आप नरेगा के तहत काम करने वाले मजदूरों को देखें और आप राज्य में काम कर रहे कृषि मजदूरों को देखें तो आप पाएंगे कि इन मजदूरों में से बहुत कम ही हैं, जो नरेगा के तहत काम कर रहे हैं। दिक्कत यह है कि बड़े किसान उन्हें बहुत कम पैसा देते हैं, अगर आपको ज्यादा मजदूर चाहिए तो आपको ज्यादा पैसा देना होगा।
विरोधी दलों की राज्य सरकारें, जैसे उत्तर प्रदेश की, क्या इस योजना में बाधा पैदा कर रही हैं?
निचले स्तरों पर कानून को उसकी भावना के अनुरूप लागू नहीं किया ज रहा। बदकिस्मती से प्रावधानों को ठीक से लागू नहीं किया गया। कानून बन गया तो भावना के अनुरूप इसके प्रावधानों को लागू भी किया जाना चाहिए।
भूमि अधिग्रहण विधेयक में क्या बाधा है?
यह मामला मंत्रिमंडल के पास है, इसलिए मैं इस पर टिप्पणी नहीं करूंगा। हमारी सरकार गठबंधन सरकार है और हमें अपने सहयोगी दलों की भावनाओं का ख्याल रखना ही होगा। पिछली बार यह बिल लोकसभा में पास हो गया था लेकिन राज्यसभा में पास नहीं हो सका था।
ममता बनर्जी की चार मांगे हैं, एक तो यह कि सराकर को व्यापारिक घरानों के लिए अधिग्रहण नहीं करना चाहिए, दूसरे जबरन अधिग्रहण नहीं होना चाहिए, तीसरे खेती वाली जमीन का अधिग्रहण नहीं होना चाहिए और चौथा अगर तय समय सीमा तक काम शुरू नहीं होता तो किसानों को जमीन वापस लेने का अधिकार होना चाहिए। इन पर आप क्या सोचते हैं?
एक चीज स्पष्ट होनी चाहिए कि क्या हम किसानों की जरूरत को पूरा करना चाहते हैं? तब हमें देखना होगा कि विस्थापन और पुनर्वास के लिए कितनी जगह चाहिए। अभी जब यह संशोधन नहीं हुआ है तो जमीन का शत-प्रतिशत अधिग्रहण हो सकता है। अगर यही जारी रहा तो किसानों को कैसे बचाया जा सकेगा। बाकी हमारे राजनैतिक सहयोगियों की जो भावनाएं हैं, हम उनका ख्याल रखेंगे।
क्या आपको उम्मीद है कि 2011 के पश्चिम बंगाल चुनाव से पहले इस पर सहमति बन जाएगी?
यह सब ऐसे मसले हैं, जो उच्च स्तरों पर देखे जाने हैं।
क्या सोनिया गांधी भी यह कह रही हैं कि गैरकृषि भूमि का अधिग्रहण नहीं होना चाहिए?
इस कानून में साफ-साफ कहा गया है कि गैर कृषि जमीन नहीं ली जाएगी। एक व्यवहारिक तरीका होना चाहिए। लेकिन राजनैतिक दलों की अपनी मजबूरियां हैं और हमें उनका ध्यान रखना होगा। 

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