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इतिहास की बलि चढ़ा वर्तमान

जिन्नों की तासीर भी अलग-अलग होती है। जिन्न किसी के लिये भारी पड़ते हैं तो किसी के सामने हुक्म मेरे आका कहते हुए प्रस्तुत होते हैं। जिन्न किसी के लिये कुछ भी करते आए हों, लेकिन भारतीय जनता पार्टी से जिन्नों का रिश्ता अच्छा नहींरहा। फिर बात जिन्ना के जिन्न की हो तो वह पार्टी के लौह पुरुष लालकृष्ण आडवाणी से लेकर वरिष्ठ नेता जसवंत सिंह पर भारी पड़ा है। जिन्ना का जिन्न आडवाणी को तो पार्टी से बाहर नहीं निकलवा पाया, पर जसवंत पर इतना भारी पड़ा कि उसने उन्हें पार्टी से बाहर का रास्ता तक दिखवा दिया। जिन्ना का जिन्न बेशक जसवंत के लिये बेवफा निकला हो, लेकिन जसवंत उससे बेवफाई करने के लिये तैयार नहीं हैं। वे जिन्ना के बारे में लिखी गई अपनी किताब के शब्द-शब्द पर कायम हैं। आगे भी किताबें लिखने के लिये ताल ठोक कर मैदान में उतर आए हैं। जसवंत का जिन्ना को नायक और नेहरू व सरदार पटेल को अपनी किताब में खलनायक बताना पार्टी और संघ परिवार को अच्छा नहीं लगा। उन्हें नहीं पता था कि संघ परिवार अपने विचारों के लिये कितना संकीर्ण है। पता भी कैसे होता, वे कभी संघ के स्वयंसेवक तो रहे नहीं। फौजी होने के कारण भी उनका दिमाग फौजियों की तरह काम करता है। राजस्थान के बाड़मेर जिले में 3 जनवरी 1938 में जन्मे जसवंत ने अपनी बी.ए और बी.एससी की पढ़ाई मेयो कॉलेज, अजमेर से की है। इसके बाद उन्होंने सेना में कमीशन लिया और देहरादून और खड़गवासला डिफेन्स अकादमियों में प्रशिक्षण प्राप्त किया। भाजपा से तीन दशक के रिश्तों में जसवंत के लिए विवाद और फजीहत नयी बात नहीं है। किताबें लिखने का उनका शौक उन्हें अक्सर ही विवादों में घेर लेता है। जिन्ना की प्रशंसा में लिखी ताज पुस्तक से पहले उन्होंने 2006 में ‘अ कॉल टू ऑनर: इन सर्विस ऑफ इमरजेंट इंडिया’ में पूर्व प्रधनमंत्री पी. वी. नरसिंह राव के कार्यकाल के दौरान प्रधानमंत्री कार्यालय में जसूस होने का दावा करके सनसनी फैला दी थी। हालांकि उस कथित जसूस की बात वह आज तक साबित नहीं कर पाए हैं।

इसके लिए उनकी काफी आलोचना की गई। इससे पहले सरकार में रहते 1999 में किए अपने उस कृत्य के लिए उन्हें आज तक आलोचनाओं का सामना करना पड़ रहा है, जब वह इंडियन एयरलाइंस के अपहृत विमान के यात्रियों को छुड़ाने के बदले कुख्यात आतंकवादियों को अपने साथ विमान में काबुल लेकर गए। वह अभी तक इस बात का संतोषजनक जवाब नहीं दे पाए हैं कि विदेश मंत्री रहते उन्हें आतंकवादियों को अपने साथ विमान में ले जाने की क्या जरूरत थी। वे अलग विमान में क्यों नहीं गए। एनडीए शासन में बारी-बारी से तीन मंत्रालय - वित्त, रक्षा और विदेश संभालने के बावजूद राजनीति में अपने आप को बढ़ा-चढ़ा कर कभी पेश नहीं किया। वह अल्पभाषी भी हैं लेकिन तब भी किसी न किसी कारण सुर्खियों में बने रहते हैं। पिछले साल अक्तूबर में अपने पुश्तैनी मकान में आयोजित एक समारोह में अतिथियों को अफीम मिश्रित दूध पिलाने के लिए वह विवादों से घिरे। अवैध रूप से मादक द्रव्य रखने के आरोप में उन्हें अदालत मेंघसीटा गया। अपनी किताबों को लेकर 71 वर्षीय जसवंत तीन साल में दूसरी बार विवादों के घेरे में आए हैं। इस बार फर्क यह है कि पिछली बार वह केवल कांग्रेस की आलोचना का ही शिकार बने थे, लेकिन इस बार नेहरू की निंदा और जिन्ना की तारीफ करने में कांग्रेस के साथ अपनी पार्टी की आलोचना ही नहीं झेलनी पड़ी, बल्कि उन्हें बिना नोटिस के सीधे बाहर कारास्ता दिखा दिया गया। पार्टी से बेआबरू हो कर निकाले जने से आहत जसवंत ने कहा, मैं हनुमान हुआ करता था, अब मेरे साथ रावण जैसा बर्ताव हो रहा है। गोल्फ के साथ अच्छी शराब के शौकीन माने जाने वाले जसवंत अपनी हाजिर जवाबी के लिए मशहूर हैं। इस बार वह गोरखा जनमुक्ति मोर्चा के समर्थन से पश्चिम बंगाल के दाजिर्लिंग सीट से लोकसभा के लिए चुने गए हैं।

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