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सिकंदर: आतंक के साए में बचपन

सिकंदर: आतंक के साए में बचपन

सितारे: परजान दस्तूर, आयशा कपूर, संजय सूरी, आऱ माधवन, अरुणोदय सिंह
निर्माता-बैनर: सुधीर मिश्रा, सुधीर मिश्रा प्रोडक्शंस और बिग पिक्चर्स
निर्देशक, लेखक: पीयूष झा
गीत: प्रसून जोशी, नीलेश मिश्रा और कुमार
संगीत: शंकर-अहसान-लॉय, जस्टिन, उदय और संदेश शांडिल्य


कहानी: कश्मीर की खूबसूरत वादियों में रहने वाला 14 साल का सिकंदर (परजान दस्तूर) फुटबॉल का अच्छा खिलाड़ी है। उसका सपना है कि वह एक दिन फुटबाल का बड़ा खिलाड़ी बने। सिकंदर कश्मीर में अपने चाचा-चाची के साथ रहता है, क्योंकि दस साल पहले आतंकवादियों ने उसके माता-पिता को मार दिया था। नसरीन (आयशा कपूर) सिकंदर की अच्छी दोस्त है और उसके ही स्कूल में पढ़ती है। एक दिन स्कूल से घर लौटते समय सिकंदर को रास्ते में एक पिस्तौल पड़ी मिलती है। वह उसे उठाकर अपने बस्ते में रख लेता है। इस पिस्तौल से सिकंदर शुरुआत में अपने कुछ दोस्तों को डराता है, लेकिन देखते ही देखते वह पिस्तौल उसके लिए आफत बनने लगती है। उधर, कश्मीर में आतंकियों की बढ़ती वारदातों के मद्देनजर ले. कर्नल राजेश पी़ राव (आऱ  माधवन) अपने जवानों के साथ रात-दिन आतंकियों की धर-पकड़ में व्यस्त है। ऐसे में जब-जब उसका सामना मुख्तार मट्टू(संजय सूरी) से होता है तो आतंकियों के साये में कश्मीर में पनपती राजनीति की सच्चाई भी सामने आने लगती है। तो उधर, सिकंदर के पास पिस्तौल है, इस बात की खबर एक आतंकी गुट के कमांडर जगीर कादीर (अरुणोदय सिंह) को लग जाती है। वह सिकंदर को फुसलाकर निशाना लगाना सिखाता है और एक व्यक्ति को खत्म करने का हुक्म देता है। लेकिन उसके रास्ते में नसरीन आ जाती है। इस बात का पता जब जगीर को चलता है तो वह सिकंदर पर बहुत भड़कता है। निशाना न लगा पाने की कश्मकश के बीच सिकंदर के हाथों से वह पिस्तौल उसके तीन दोस्त छीन लेते हैं। इसके बाद उन तीन लड़कों को आतंकी गोली मार देते हैं। अब तक सिकंदर के लिए वह पिस्तौल मुसीबत बन चुकी होती है।

निर्देशन: कश्मीर की खूबसूरत वादियों में पीयूष झा ने आतंकवाद जैसे मुद्दे के बीच दो बच्चों की कहानी को शानदार तरीके से दिखाने की कोशिश की है। लेकिन कमजोर स्क्रीनप्ले ने उनका साथ नहीं दिया। हालांकि फिल्म की कहानी उन्होंने ही लिखी है, लेकिन वह सिकंदर, नसरीन और पिस्तौल की आफत को ठीक से बयां नहीं कर पाए। फिल्म के निर्माता सुधीर मिश्रा की फिल्में अपनी दमदार कहानी और रोमांचक स्क्रीनप्ले के कारण याद रखी जाती हैं, लेकिन पीयूष के पास ऐसा कुछ नहीं दिखता। उन्होंने कई जगह फिल्म में पकड़ बनाने की कोशिश की और आतंकवाद में बच्चों के इस्तेमाल पर अपना फोकस भी किया, पर कई जगह महीन बातों को वह भूल गये। मस्जिद में होने वाला धमाका फिल्म में चौंकाता है और उत्सुकता पैदा करता है, पर उसके बाद भी उनके हाथों से निर्देशन फिसलता गया। 

गीत-संगीत: ऐसी फिल्मों में संगीत की गुंजाइश काफी कम रहती है। फिर भी प्रसून जोशी द्वारा लिखा गया गीत धूप के सिक्के काफी अच्छा बन पड़ा है।

अभिनय: अब तक फिल्मों में छोटे-मोटे बाल कलाकार के रूप में दिखने वाले परजान दस्तूर ने पहली बार किसी फिल्म में बड़ा रोल किया है। अभिनय के लिहाज से उन्हें अभी काफी कुछ सीखना है, लेकिन फिल्म के कई गंभीर दृश्यों में वह अच्छे लगे हैं। आयशा कपूर से काफी उम्मीदें थीं। पर इससे अच्छा अभिनय उन्होंने ब्लैक फिल्म में किया था। जगीर की मौत के बाद वाले सीन में वह बिल्कुल नहीं जमीं। हालांकि उनके रोल में कई उतार-चढ़ाव हैं, लेकिन निर्देशक अच्छी कलाकार से बेहतर काम न करवा सके। आर. माधवन का रोल काफी बैलेंस है और संजय सूरी ने कई सीन्स में प्रभावित किया है। अरुणोदय सिंह छोटे रोल में काफी असर छोड़ने में कामयाब रहे।

क्या है खास: काफी दिनों बाद किसी फिल्म को कश्मीर की खूबसूरत वादियों में इतनी खूबसूरती से कैद किया गया है। लोकेशंस के अलावा फिल्म में कुछ उतार-चढ़ाव ऐसे हैं, जो चौंकाते हैं।

क्या है बकवास: क्लाइमैक्स के समय किरदारों की नाटकीयता और ब्लास्ट का असर भद्दा लगता है। 

पंचलाइन: एक अच्छे मुद्दे को भटका हुआ क्लाईमैक्स और स्क्रीनप्ले मार गया। वरना यह एक अच्छी फिल्म बन सकती थी।        

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