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धत्तेरे की मि. कॉक्रोच

मुझे कॉक्रोचों से बेहद डर लगता है। देखते ही सारी हेकड़ी फुर्र हो जाती है। दिल का कच्चा नहीं हूं। चीते, आतंकवादी और क्रिमिनल नेता को फेस कर सकता हूं, कॉक्रोच को नहीं। विज्ञान की पढ़ाई के दौरान कितने ही काक्रोच चीर फाड़ डाले। मगर तसल्ली रहती थी कि मर हुए हैं। यह मेरा बोदापन नहीं, एलर्जी है। आखिर नेपोलियन तक बिल्लियों से डरता था और चीतों का शिकारी जिम कार्बेट मधुमक्िखयों से। मेरे अच्छे मित्र मुद्राराक्षस ने बरसों पहले एक टीवी नाटक लिखा था- ‘कॉक्रोच’। काफी सफल रहा, पर मैंने नहीं देखा। पहले ही पता लग गया था कि नाटक में तीन-चार कॉक्रोच बिस्तर पर रंगते दिखाए गए थे। मेर तो प्राण पखेरू ही फ्लाई कर गए होते। मुद्रा भाई से तीन-चार रो खुन्नस बनी रही। कोई और नाम नहीं रख सकते थे भला? कुछ होते हैं ‘ह्यूमन कॉक्रोच’। इधर से उधर सरक जाने में माहिर। हाल फिलहाल उनका सीजन निपट गया। डरते थे कि उनके आलीबाबा अपनी हार का घड़ा उनके सिर पर न फोड़ दें और जब्त शुदा जमाइन चालीस चोरों..उहं..कॉक्रोचों से न वसूल लें। काटरूनिस्ट भाई धोड़पकर जी का आभारी हूं कि पूर चुनाव भर उन्होंने कॉक्रोचों को इधर से उधर रंगते नहीं दिखाया..(शायद उन्हें भी एलर्जी हो)। कॉक्रोच के बार में लोग जानते हैं कि ज्यादा ऊंचा नहीं उड़ सकता। गनीमत है कि आचार संहिता ने ऊंचा उड़ने ही नहीं दिया। कॉक्रोच की सब से बड़ी दुश्मन है छिपकली। जहां जरा उड़ा, गड़ाप से छिपकली के मुंह का ब्रेकफास्ट बन गया। आचार संहिता की छिपकली ने कितने ही छुटभैये कॉक्रोचों को ग्रास बना लिया। कुछेक हिम्मत करके उछले और कट्टा पिस्तौल का जलवा दिखा दिया। जूते में पांव डालने के अलावा अंदर बैठे कॉक्रोच का पता लगाने का कोई रास्ता नहीं। कॉक्रोचों की राीडेन्स अमूमन बाथरूम में होता है। जीव शास्त्रियों का कहना कि धरती पर कॉक्रोच सब से पुराना जीवित प्राणी है। चरके बाज, मौज उड़ाऊं और झंडाबरदार भी पृथ्वी पर काफी पुराने हैं। जिधर घी की तरावट देखी उधर सरक गए और ‘जय हो’ बोलने लगे। आचार संहिता का ‘इलाज’ न होता तो चुनाव में ऊधम जोत डालते। प्राप्त न्यूजों के अनुसार कई स्थानों पर कॉक्रोचों के अलावा प्रत्याशी की समर्थक कॉक्रोचिनों ने भी बवाल खड़ा किया। सारी जूलॉजी पढ़ लेने के बाद भी मुझे नर और मादा कॉक्रोच का ऊपरी फर्क नहीं मालूम। प्रेस वाले सब पता लगा लेते हैं कि किस प्रत्याशी के कॉक्रोच हैं..किसके माल पर तर होकर कंगना झनका रही हैं कॉक्रोचिनें। बहरहाल, चुनाव आयोग की अनुकंपा से निपट गया महामेला। यानी बकौल शायर, ‘बड़ा शोर सुनते थे हाथी की दुम का.जो देखा तो फुट भर की रस्सी बंधी थी।’

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  • Web Title: धत्तेरे की मि. कॉक्रोच