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भटके मानसून का विकल्प तो ढूंढ़िए

अब हमें मान लेना चाहिए कि मानसून ने हमें दगा दे दिया है। ऐसा पहले भी कई बार हुआ है। लेकिन इस बार जैसा नहीं हुआ। अभी तो महज हम बेहतर मानसून को याद ही कर सकते हैं। तीन-चार दिन तक लगातार बारिश का होना। सड़क और बागों में पानी भर जाना। रात में हजारों मेंढकों का टर्र-टर्र करना। धुले हुए पेड़ों और झाड़ियों में बिजली की चमक देखना।

फिलहाल तो हमें सूखा पड़ता नजर आ रहा है। जाहिर है हमें खरीफ फसलों की कमी को झेलना पड़ेगा। खासतौर से चावल की कमी से जूझना होगा। यहां सवाल उठता है क्या हमारे पास पहले से इतना भंडार है कि इस दिक्कत से पार पा सकें? क्या अपने पास ऐसी मशीनरी है, जो गरीबों-भूखों को अनाज पहुंचा सके? मुझे उम्मीद की कोई किरण नजर नहीं आती। इस अटके-भटके मानसून से कुछ सबक जरूर सीखे जा सकते हैं। हमने देखा कि तकरीबन हर रोज बादल छाते थे। बादल देख कर लगता भी था कि पानी वाले हैं। महसूस होता था कि बारिश होगी। लेकिन वे बिना बूंद टपकाए चले जाते थे। मैंने सुना है कि एक तकनीक है, जिससे माहौल में बादल लाए जा सकते हैं। एक खास तापमान तय किया जा सकता है। फिर उन्हें बरसाया भी जा सकता है। अपने यहां सूखे से कितना बड़ा हिस्सा जूझ रहा है। लेकिन मुझे याद नहीं पड़ता कि उसका इस्तेमाल कभी अपने यहां किया गया हो। आखिर जब जरूरत थी, तो ऐसा क्यों नहीं किया गया? उस पर क्यों नहीं सोचा जा रहा? इधर हम बहुत कुछ वाटर हार्वेस्टिंग के बारे में सुनते रहे हैं। कितना हो-हल्ला उस पर मचाया जता रहा है। कई जगह से रिपोर्ट भी आई हैं कि कुछ गांवों में ऐसा किया गया है। वहां के कुंओं और तालाबों पर उसका असर भी पड़ा है। वहां का जलस्तर नीचे नहीं गया है। वहां लोग उससे अपने खेतों में पानी भी दे सके हैं। सबसे बड़ी बात यह हुई है कि उससे उनकी फसल बर्बाद होने से बच गई। अगर वहां ऐसा मुमकिन हुआ है, तो वैसा ही पूरे देश में क्यों नहीं हो सकता? अब हमें समझ लेना चाहिए कि बारिश के देवता की प्रार्थना करने से कुछ नहीं होने वाला है। हमें भटके हुए मानसून का इलाज ढूंढ़ना ही चाहिए।

जन्नत गई
शेख मोहम्मद अब्दुल्ला की नातिन हैं नाएला अली खां। शेख साहब को शेर-ए-कश्मीर भी कहा जाता है। अपने नाना के लिए बेहद इज्जत नाएला के दिल में है। कश्मीर के बारे में उनकी सोच से वह सहमत हैं। उनकी तरह वह भी चाहती हैं कि कश्मीर अमन की जन्नत और सांप्रदायिक सद्भाव की मिसाल कायम करे। गांधी, गफ्फार खां और नेहरू से इत्तिफाक रखते थे शेख साहब। वह सेकुलर हिंदुस्तान की बात करते थे। जिन्ना और मुस्लिम लीग की दो देश की थ्योरी को मानने को तैयार नहीं थे वह। शायद इसीलिए जब अंगरेजों ने मुल्क छोड़ा, तो उन्होंने इस्लामी पाकिस्तान के बजाय सेकुलर हिंदुस्तान को चुना। मेरे ख्याल से वह कश्मीरियत की जीत थी। उसमें हर मजहब के लिए जगह थी। झेलम की घाटी में जो सूफी इस्लाम चलता है, वह उसकी बुनियाद थी। वह सूफी इस्लाम कश्मीरी शवों की इज्जत करता था। लेकिन उसके बाद कश्मीर में सब कैसे बदल गया? कश्मीरी पंडितों को क्यों अपना घर छोड़ना पड़ा? आखिर उदार कश्मीरी मुसलमान अचानक कट्टर कैसे हो गया? हाल ही में अपनी किताब में नाएला ने इन जवाबों को तलाशने की कोशिश की है। तूलिका बुक्स से आई यह किताब है, ‘इस्लाम, वीमेन ऐंड वॉयलेंस इन कश्मीर बिटवीन इंडिया ऐंड पाकिस्तान।’ नाएला अली खां ने दिल्ली के लेडी श्रीराम कॉलेज से ग्रेजुएशन किया है। उन्होंने अपनी पीएचडी ओकलाहामा यूनिवर्सिटी से की। फिलहाल वह नेब्रास्का यूनिवर्सिटी में अंग्रेजी की प्रोफेसर हैं। वह पिछले दस साल से अमेरिका में रह रही हैं। उन्होंने अमेरिकी नागरिकता भी ले ली है। लेकिन उनका दिल अब भी कश्मीर में ही धड़कता है। कश्मीर से अपना जुड़ाव बनाए रखने के लिए नाएला वहां आती-जाती रहती हैं। अगर नहीं भी आती हैं, तो उनकी चिट्ठी-पत्री होती रहती है। वह कश्मीर को लेकर परेशान होती हैं। कश्मीरी कवियों और लेखकों को वह लगातार पढ़ती हैं। लालद्यद के पदों की वह दीवानी हैं। हालांकि इस किताब में जो भी आया है, उसका अनुवाद बेहद खराब हुआ है। यह किताब उनका शोध है। उससे इतना तो जाहिर होता ही है कि नाएला किस कदर अपने पुरखों की जमीन से जुड़ी हैं।

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