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चीन की धमकी और मुस्कान का खेल

‘अगर चीन थोड़ी सी भी कोशिश करे तो महान भारतीय संघ टूट जाए’- चीनी भाषा में लिखे गए उस लेख का यही शीर्षक था। यह लेख चाईनीज़ इंटरनेशनल इंस्टीच्यूट ऑफ स्ट्रेटजिक स्टडीज़ के वेबसाइट पर आठ अगस्त को दिखाई पड़ा। यानी जब दिल्ली में हो रही भारत चीन सीमा वार्ता का आखिरी दिन था। इसके लेखक थे झन लुए, चीनी भाषा में इस शब्द का अर्थ होता है रणनीति। यह लेख कहता है कि भारत की एशिया नीति ‘हिंदुस्तान’ को ध्यान में रखकर बनाई जाती है और दरअसल इसके कई केंद्र हैं, इतिहास में ‘भारतीय राष्ट्र’ जैसी कोई चीज नहीं थी।

वैसे इस नजरिये में कोई नई बात नहीं है। भारतीय इतिहास का कैंब्रिज स्कूल भी लगभग यही बात कहता है। तर्क यह है कि पश्चिम में जिस तरह से राष्ट्र राज्य होता है, वैसी भारत नाम की कोई चीज कभी नहीं रही। इसे तो कई राज्यों को कृत्रिम रूप से मिलाकर बनाया गया है। पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री ज्योति बसु और अशोक मित्रा जैसे मार्क्सवादी भी यही मानते हैं। इसी गर्मियों में चुनाव के दौरान अशोक मित्रा ने मुझसे यही बात कही थी, हालांकि वे इस हद तक नहीं गए कि परस्पर विरोधी दबावों के कारण यह टूट जाएगा। अब यही बात कामरेड झन लुए कह रहे हैं, उन्होंने इसे चीन के कुछ हिस्सों में बढ़ रही कट्टरता के साथ जोड़ दिया है। झन का यह लेख जिस समय आया, ठीक उसी समय चीन के सबसे ज्यादा प्रसार वाले अखबार पीपुल्स डेली में भारत पाक सीमा वार्ता पर एक और लेख छपा। इसे झंग यान यानी भारत में चीन के राजदूत ने लिखा था। ये दोनों ही लेख पूरी तरह अलग है। यान का लेख कहता है, ‘चीन और भारत को अपने सीमा विवाद को अपनी पूरी समझदारी का परिचय देते हुए ठीक से निपटा लेना चाहिए। इस सीमा विवाद के उतार चढ़ाव के बावजूद दोनों देशों के ऐतिहासिक उत्तरदायित्व एक जैसे हैं.. दोनों देशों को अपने राजनयिक रिश्तों की 60वीं वर्षगांठ का इस्तेमाल आपसी संबंध बढ़ाने में करना चाहिए.’।
अब इसमें चीन का असली नजरिया क्या है? निश्चित रूप से ये दोनों ही लेख पेईचिंग में आला अधिकारियों की इजजत से ही छपे होंगे। सवाल यह है कि क्या चीन भारत का दोस्त बनना चाहता है या दुश्मन? क्या चीन में इन दिनों भारत विरोध काफी ज्यादा बढ़ गया है?

दोनों देशों के राजनयिक रिश्तों की साठवीं सालगिरह अगले साल है, और यह पूरा रिश्तों का एक दिलचस्प दौर है। राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल इसके समारोह में भाग लेने चीन जाएंगी और चीन के उप-राष्ट्रपति शाई जिनपिंग भारत आएंगे। और पिछले दिनों दोनों देशों की वार्ता के 12वें दौर के बाद यह खबर आई कि दोनों देशों के बीच विश्वास बहाली के उपाय के तौर पर एक हॉटलाइन लगाई जाएगी। इस बीच दोनों देशों का आपसी व्यापार 52 अरब डॉलर तक पहुंच गया है। जाहिर है कि भारतीय पक्ष मतभेदों को ज्यादा तूल नहीं दे रहा। जबकि पिछले साल न्यूक्लियर सप्लायर्स ग्रुप में चीन ने भारत को परमाणु ईधन दिए जाने के मामले को आखिर तक लटकाए रखा था। और इसके बाद अगर झन लुए का लेख आता है तो यह और भी हैरत की बात है। वे कहते हैं कि भारत को जोड़ने का अकेला कारक हिंदू धर्म है, इस पर ध्यान दीजिए कि भारत का विभाजन हिंदू मुस्लिम लाइन पर ही हुआ था। वे यह भी मानते हैं कि हिंदू धर्म एक ऐसा धर्म है जिसका लगातार क्षरण हो रहा है क्योंकि यह जति आधार पर शोषण की इजाजत देता है। इस वजह से उसका आधुनिकीकरण नहीं हो पा रहा। अगर आपको ये बातें कुलजमा मार्क्सवादी लफ्फाजी की तरह लगती हैं तो देखिए कि वे आगे क्या कहते हैं- यह चीन और बाकी एशिया के हित में है कि चीन भारत की विभिन्न ‘राष्ट्रीयताओं’ जैसे असमिया, कश्मीरी, तमिल के साथ हाथ मिलाए और उनकी स्वतंत्र राष्ट्र-राज्य बनने में मदद करे। इसके साथ ही चीन को बांग्लादेश को तैयार करके बंगालियों को भारत के प्रभाव से मुक्त कराना चाहिए, बाकी जगहों के लिए पाकिस्तान, नेपाल और भूटान की मदद लेनी चाहिए। क्या हमें इस लेख को झन लुए की सनक मान लेना चाहिए?

चीन के अंग्रेजी अखबार ‘ग्लोबल टाइम्स’ में सात अगस्त को एक और लेख छपा है, भारत चीन सीमा वार्ता पर लिखे गए इस लेख में हांगकांग के अखबार ‘मिंग पाओ’ के हवाले से लिखा गया है, ‘..मौजूदा हालात सीमा विवाद हल करने के लिए चीन के पक्ष में नहीं हैं। अभी देश पूरी दुनिया में ऊपर की ओर जा रहा है, इस समय जल्दबाजी नहीं दिखाई जानी चाहिए क्योंकि हो सकता है कि हम विवाद को ठीक से न निपटा पाएं। नतीजा यह होगा कि आने वाली पीढ़ियां हम पर आरोप लगाएंगी।’जाहिर है कि एक तरफ तो भारत के खिलाफ सुर ऊंचे होने लगे हैं और दूसरी तरफ एक विनम्र मुस्कान भी दिख रही है जो पंचशील के आधार पर रिश्ते सुधारने की बात करती है। हमेशा की तरह ही यह भी हो सकता है कि सच इसके बीच में कहीं हो। चीन अगले कुछ साल में दस फीसदी से ज्यादा विकास दर बनाए रखना चाहता है। अमेरिका और बाकी दुनिया को पता है कि इसके बाद वह सबसे ताकतवर देश होगा।

ऐसे में क्या भारत अरुणाचल प्रदेश के त्वांग की उस जमीन को बचाए रख सकता है जिसकी चीन काफी समय से मांग कर रहा है? चीन एक पुरानी सभ्यता है और उसमें धैर्य रखने और इंतजार करने की पूरी क्षमता है। लेकिन भारत भी अमीर और समृद्ध भले ही न हो, लेकिन वह भी प्राचीन है और लोकतांत्रिक गणराज्य है। जब मसला राष्ट्रहित का हो तो इंतजार करने का खेल वह भी खेल सकता है। फिलहाल इसकी कोई संभावना नहीं है कि कश्मीर की नियंत्रण रेखा की तरह ही त्वांग में भी एक साफ्ट बार्डर तैयार किया जाए जिसमें इस पार और उस पार दोनों ही तरफ के तीर्थयात्री आ जा सकें। कम से कम निकट भविष्य में तो ऐसा नहीं होने वाला। बाकी सब तो वह खेल है जिसे दुनिया के राष्ट्र आपस में खेला करते हैं।
jomalhotra@gmail.com
लेखिका स्वतंत्र पत्रकार हैं

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