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श्रीमंत का अंतिम समय

उस समय श्रीमंत शंकरदेव 120 साल के हो चुके थे। अपने ‘एक शरणिए नाम धर्म’ को पूरे असम में फैला चुके थे वह। अपने आखिरी साल में भी उन्होंने ‘राम विजय’ नाटक लिखा और खेला। लेकिन अब वह समझ गए थे कि शरीर जवाब देने लगा है। बैकुंठ धाम जाने का समय आ गया है। शंकरदेव जिंदगी भर समता की बात करते रहे थे। हर किस्म के भेदभाव के खिलाफ लड़ते रहे। वह एक मायने में ‘हरि को भज सो हरि को होई’ के सिद्धांत को मानने वाले थे। और जो हरि को भज रहा है, वह हरि का हुआ। ऐसे में किसी किस्म का भेदभाव कहां हो सकता है? वह जन्म और जाति के किसी बंधन को मानने वाले नहीं थे। वह तो कह रहे थे- ‘परम निर्मल धर्म हरिनाम कीर्तन, त समस्त प्राणीर अधिकार। एतेके से हरिनाम समस्त धर्मेर राज, एहि सार शास्त्रार विचार।।’ वह चाहते थे कि उनके साथ लोग खुले मन से आएं। प्रभु की शरण के अलावा कुछ भी उनके मन में न हो। वह अपने धर्म को सामान्य धर्म रखना चाहते थे। शायद इसीलिए उन्होंने तब के राज नरनारायण को दीक्षित करने से मना कर दिया था। राज जिद कर रहे थे और वह तैयार नहीं थे।

श्रीमंत का उत्तराधिकारी कौन हो? उनके शिष्यों की कोई कमी नहीं थी। लेकिन खुसुर-पुसुर यही थी कि वह अपने किसी बेटे को ही उत्तराधिकारी बनाएंगे। उनके तीन बेटे थे। बीच के बेटे की मृत्यु हो चुकी थी। बड़े रामानंद और कमल लोचन मौजूद थे। सब जानते थे कि दोनों बेटे प्रतिभाशाली नहीं हैं। लेकिन बच्चों को लेकर किसे मोह नहीं होता! श्रीमंत ने एक दिन अपने परिवार और शिष्यों को बुलाया। कहा कि अब उनको जाना होगा। इसलिए उत्तराधिकारी तय करना है। परिवार और शिष्य एकटक उन्हें देखे जा रहे थे। आखिरकार उन्होंने माधवदेव को ही अपना उत्तराधिकारी बनाया। वही माधवदेव जो उनके सबसे काबिल शिष्य थे। और एक दौर में उनके साथ जम कर बहसें भी हुई थीं। शंकरदेव ने जिस किस्म का जीवन जिया था। उसी के अनुसार ही उन्होंने अपने उत्तराधिकारी को चुना। आज शंकरदेव का महासमाधि दिवस है। एक शरण का मार्ग दिखाने वाले महापुरुष को प्रणाम।

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