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उपचुनाव के संकेत

विधानसभा उपचुनाव के नतीजों के पीछे कोई प्रांतव्यापी जनादेश नहीं होता। बस उसमें राजनीति की बयार के कुछ संकेत भर ढूंढे जा सकते हैं। जो नतीजे फिलहाल हमारे सामने हैं, उनमें कोई वृहद् राष्ट्रीय संकेत नहीं है। कुछ ही महीने पहले हमने आमचुनाव के समय जो तस्वीर देखी थी, उसकी कोई निरंतरता भी इसमें नहीं झलकती। शायद इसलिए भी कि वे राष्ट्रीय चुनाव थे और अब जो उपचुनाव हुए हैं वे विधानसभाओं के हैं। फिलहाल जो ट्रेंड आए हैं, उनकी तासीर बहुत कर के राज्यव्यापी है। तमिलनाडु में जिन पांच सीटों पर उपचुनाव हुआ, उसे चुनाव कहना भी शायद गलत होगा। मुख्य विपक्षी पार्टी अन्नाद्रमुक ने इन उपचुनावों का बहिष्कार किया था, इसलिए नतीजे एकतरफा ही रहने थे, द्रमुक और कांग्रेस ने इन सारी सीटों पर आराम से कब्ज कर लिया। यह एकतरफा जीत तमिलनाडु विधानसभा के मध्यावधि चुनाव की ओर भी ले ज सकती है। उत्तर प्रदेश में ऐसा नहीं था। वहां सभी दल जोर-शोर से चुनाव जीतने में जुटे थे, लेकिन बहुजन समाज पार्टी ने चार में से तीन सीटें जीतकर यह बता दिया कि प्रदेश की राजनीति से बसपा और मायावती को खारिज करना इतना आसान भी नहीं है। साथ ही यह भी कि उत्तर प्रदेश में अपनी वापसी के
लिए कांग्रेस को अभी काफी मेहतन करनी होगी।

उधर पश्चिम बंगाल में मतदाता अभी भी वामपंथी सरकार से खफा ही है। दोनों उपचुनाव जीतकर तृणमूल कांग्रेस की ममता बनर्जी ने यह तो बता ही दिया कि अब उन्हें रोक पाना वाममोर्चे के पूरे लाव-लश्कर के लिए आसान नहीं है। कर्नाटक के नतीजे ऑपरेशन कमल के दूसरे दौर की कामयाबी की कहानी जरूर कहते हैं, लेकिन वह ये भी बताते हैं कि जनता दल सेक्युलर वहां अभी भी दूसरे नंबर की बड़ी ताकत बनी हुई है। कांग्रेस के लिए मेघालय से जरूर अच्छी खबर है। लेकिन कुलजमा नतीजे कांग्रेस के लिए किसी बुरी खबर की ही तरह हैं, भले ही वह केंद्र या राज्य में उसकी किसी सरकार के लिए फिलहाल खतरे की घंटी न बजा रहे हों। पिछले आमचुनाव के नतीजों से राजनीति में बदलाव की जो कल्पनाएं कर ली गईं थीं, वे इतनी आसान नहीं हैं, उपचुनाव के नतीजे सिर्फ इतना ही बताते हैं कि दिल्ली के तख्त पर बैठी पार्टी अभी चक्रवर्ती बनने की ओर अग्रसर नहीं है। कर्नाटक छोड़कर नतीजे भाजपा के लिए भी अच्छी खबर नहीं हैं, लेकिन उसके लिए ज्यादा बुरी जो खबरे हैं वे उपचुनाव से इतर हैं।

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