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चिंतन की चिंगारियां

अगर जसवंत सिंह के निष्कासन को भी चिंतन बैठक का एक हिस्सा मान लें तो तमाम गोपनीयता के बावजूद इस बैठक का मुख्य सूत्र समझ में आता है। वह सूत्र यह है कि लोकसभा चुनावों में हार के बाद जिस तरह की अराजकता और अनुशासनहीनता पार्टी में व्याप्त थी, उसे विराम लगाने का वक्त शुरू हो गया है। तथाकथित बाल आपटे समिति की रपट से ज्यादा महत्वपूर्ण इस संदर्भ में सरसंघ चालक मोहन भागवत के कुछ बयान हैं, जो भाजपा की दिशा तय करेंगे। इसके आधार पर यह कहा जा सकता है कि भाजपा का आने वाले दिनों में मुख्य मुद्दा हिंदुत्व होगा। दूसरे, पार्टी का नेतृत्व अगली पीढ़ी को सौंपा जएगा, और यह नेतृत्व राष्ट्रीय स्वयंसंवक संघ का आज्ञाकारी होगा। इसका अर्थ यह है कि जसवंत सिंह अकेले नहीं होंगे, जिन्हें हाशिए पर किया गया है। ऐसे कई वरिष्ठ नेता विनम्रता पूर्वक या इसके बिना भी रिटायर कर दिए जाएंगे। चिंतन बैठक में चिंतन जो भी कुछ हुआ हो, सूत्र आरएसएस ने तय कर दिए हैं। यानी अब भाजपा को व्यापक जनाधार वाली अपेक्षाकृत उदारवादी पार्टी बनाने का काम स्थगित कर दिया गया है।

यह इसलिए भी संभव हो पा रहा है, क्योंकि अटल बिहारी वाजपेयी के हट जने और लालकृष्ण आडवाणी के कमजोर हो जने के बाद भाजपा में ऐसा कोई नेता नहीं है, जिसकी राष्ट्रीय सतर पर पहचान और जनाधार हो। दूसरी पंक्ति के लगभग सभी नेता तभी महत्वपूर्ण पद पा सकते हैं, जब उनके पीछे संघ हो। ऐसा लगता है कि लालकृष्ण आडवाणी ने ससम्मान रिटायर होने की योजना को स्वीकृति दे दी है, इसीलिए उन्होंने और उनके समर्थक नेताओं ने जसवंत सिंह के निष्कासन का भरपूर समर्थन किया है। यह संभव है कि संघ के करीबी राजनाथ सिंह जैसे नेताओं के साथ आडवाणी समर्थक कुछ दूसरी पंक्ति के नेता भाजपा के अगले सत्ता समीकरण में दिखें। हालांकि इस स्थिति में संघ और उसके आज्ञाकारी नेता खुश हो सकते हैं, लेकिन यह भाजपा विरोधियों के लिए भी कुछ प्रसन्न होने का मौका है। अगर भाजपा सिमटती है तो इसका लाभ उन्हें ही होगा। यह संभव है कि भाजपा शासित कुछ राज्यों के नेता अपनी राजनैतिक जरूरतों के मद्देनजर इस स्थिति में असहज महसूस करें और कुछ व्यापक जनाधार वाले नेता भी नए निजाम को न माने, ऐसे में संघ के लिए एकछत्र अनुशासन बनाए रखना उतना आसान नहीं होगा।

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