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उन्होंने कहा, फांसी नहीं गोली से उड़ा दो

शहीद एक गरिमामय शब्द है। यह जिस मृतक के नाम से जुड़ जाता है, वह इतिहास के पृष्ठों में अमर हो जाता है। ऐसे शहीदों में जिनका नाम प्रमुखता से उभरता है उनमें हैं- भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु। इनके त्याग और बलिदान को कभी भुलाया नहीं जा सकता। 23 मार्च, 1ो इन्हें फांसी दी गयी। जहां सुखदेव, भगत सिंह और राजगुरु की फांसी की सजा बदलवाने की मांग जोर पकड़ रही थी, वहीं तीनों मर मिटने की मानसिकता बना चुके थे। महात्मा गांधी के नाम अपनी चिट्ठी में उन्होंने स्पष्ट लिखा था- ‘सच पूछा जाये तो उनकी सजा घटाने की अपेक्षा, उनके फांसी पर चढ़ जाने से ही अधिक लाभ होने की आशा है।’ फांसी के इन तीनों राजबंदियों का जबरदस्त आक्रोश इस बात से प्रकट होता है कि यह फांसी को अपने लिए शर्मनाक समझ रहे थे। फांसी पर चढ़ाने से अधिक उन्हें अपने को फौजी दस्ते द्वारा गोली से उड़ा दिया जाना पसंद था। फांसी के कुछ दिन पूर्व सुखदेव, भगतसिंह और राजगुरु ने दया प्रार्थना से इंकार करते हुए पंजाब प्रांत के गवर्नर के नाम एक संयुक्त पत्र लिखा था, जिनकी कुछ पंक्ितयां इस प्रकार हैं- ‘अंत में हम केवल यह कहना चाहते हैं कि आपकी अदालत के फैसले के अनुसार हम पर सम्राट के विरुद्ध युद्ध करने का अभियोग लगाया गया है और इस प्रकार हम युद्ध के राजबंदी हैं। अतएव हमें फांसी पर न लटकाकर गोली से उड़ाया जाना चाहिए। इसका निर्णय अब आपके ही ऊपर है कि जो कुछ अदालत ने निर्णय किया है, उसके अनुसार आप कार्य करंगे या नहीं।’ इनकी फांसी से समस्त देश में असंतोष की आग फैल गयी और कांग्रेस अध्यक्ष सरदार पटेल ने कहा भी कि मैं उनकी कार्य पद्धति से सहमत नहीं हो सकता और इसमें संदेह नहीं कि राजनीतिक हत्या उतनी ही अवांछनीय है, जितनी एक साधारण हत्या। परन्तु सरदार भगत सिंह और उनके साथियों के अनन्य देशप्रेम, उनके अतुल त्याग, साहस और निर्भीकता की मैं स्तुति किये बिना नहीं रह सकता। इसे महात्मा गांधी ने भी स्वीकार किया।ड्ढr इस बलिदान से देश में एक नये उत्साह और उमंग का संचार हुआ और संघर्षो का काफिला तेजी से आजादी की तरफ बढ़ चला। फांसी के बाद फिर तो आजादी मिलने में कुल डेढ़ दशक ही लगे।ड्ढr (लेखक : इतिहास विभाग, मारवाड़ी कॉलेज में रीडर हैं।)ं

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