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अफ-पाक नहीं है महÊा इत्तफाक

पिछले कुछ दिनों से अमेरिकी विदेश मंत्रालय ने ओबामा के इशारे पर एक नये मुहावरे का इस्तेमाल शुरू कर दिया है। अब अफगानिस्तान और पाकिस्तान के सामरिक संकट का जिक्र अलग-अलग नहीं होता, दोनों को एक साथ ‘अफ-पाक’ कह कर पहचाना जाने लगा है- तर्क यह है कि दो जिस्म मगर एक जान हैं ये। अफगानिस्तान से तालिबान लावा बहकर जाने कब से सरहद पाकिस्तान के उत्तर-पश्चिमी इलाके में पहुंचता रहा है। यह सवाल पूछना नाजायज नहीं कि फिर इस घड़ी नई शब्दावली की क्या जरूरत उठ खड़ी हुई? उत्तर साफ है कि पूर्व राष्ट्रपति जॉर्ज बुश के तमाम बड़बोलेपन के बावजूद अमेरिका अफगानिस्तान में स्थिति सामान्य बनाने में असफल रहा है। इसका सबसे बड़ा कारण यह कि जहां एक ओर वह खूंखार तालिबान को तो सैंकड़ों की तादाद में मार डालता रहा है, वह इस बात के लिए कतई तैयार नहीं कि अमेरिकी सैनिकों की बहुमूल्य जान जरा भी खतरे में पड़े। इसीलिए मोर्चे पर तैनात अपने सहयोगी कनाडा जैसे देशों पर उसने यह जिम्मेदारी थोप दी है। कहन को बहुराष्ट्रीय फौज यह काम करती है पर किसी से असलियत छिपी नहीं। अमेरिका का कुल काम अफगानिस्तान-पाकिस्तान सीमा पर चालक रहित विमानों से निगरानी या बख्तरबंद हेलीकॉप्टरों से गोलीबारी या बम वर्षा रहा है। विडंबना यह कि यह हाईटेक युद्ध भी मनचाहे परिणाम नहीं हासिल करा सका है। जाने कितनी मासूम अफगान जानें अबतक गंवाई जा चुकी है और पाकिस्तान में भी प्रभुसत्ता के उल्लंघन के कारण गहरा असंतोष और आक्रोश है। ओसामा बिन लादेन नामक खतरनाक चूहा जाने किस बिल में अबतक निरापद छिपा है। पद भार संभालते वक्त ओबामा ने यह घोषणा की थी कि वह इराकी दलदल में फंसी अमेरिकी फौज को वापस बुला लेंगे जल्द ही। इस खुशखबरी का जश्न मनान की उतावली में अधिकांश लोग इस घोषणा का दूसरा पक्ष भूल गये, जिसमें यह ऐलान था कि अफगानिस्तान में दुश्मन को शिकस्त देन के लिए सैनिक सामरिक गतिविधियां तेज़ की जायेंगी। अमेरिका की नज़र में अफगानिस्तान और पाकिस्तान का संकट एक है-कट्टरपंथी इस्लामी आतंकवाद का, जिसका सबसे पहला निशाना अमेरिका है। वैसे तालिबान की पौध उसने खुद तैयार की थी, पाकिस्तान में अफगानिस्तान से सोवियत रूस को उखाड़ने-पछाड़ने के लिए। उस दौर में उत्तर पश्चिमी सीमांत और पूर्वी तथा दक्षिणी अफगानिस्तान की सरहद को मिटाना-धुंधलाना उसके लिए उपयोगी था। कबाइली मुखियाओं को अफीम जैसे मादक द्रव्यों की तस्करी से माला-माल करना और ताकतवर बनाना उसे अपन काम का लगता था। यही चीज़ें सिर्फ अमेरिका की नहीं, हमारी जान का भी बवाल बन चुकी है। अमेरिका के लिए अफ-पाक तर्कसंगत हो सकता है, मगर इसका मतलब यह नहीं कि भारत भी आंख मूंद कर इस भू-राजनैतिक स्थापना को स्वीकार कर ले। सबसे पहली बात जिसे रेखांकित किया जाना चाहिए, वह यह है कि इस नये सोच से अमेरिकी सामरिक नीति में भारत का अवमूल्यन अनिर्वायत: होगा। अमेरिका को पाकिस्तान द्वारा भारत पर किये गये दहशतगर्द हमलों स कोई लेना-देना नहीं। उसकी प्राथमिकता हमेशा यही रहेगी कि जिन अफगान दहशतगर्दों का पीछा उसकी सेना कर रही है, वह पाकिस्तान में शरण न ले सके। जब तक अकेले पाकिस्तान की बात की जाये भारत के साथ तुलना में वह हमेशा बहुत बौना और हल्का नज़र आता रहेगा। पर जब उसके साथ अफगानिस्तान को जोड़ दिया जाये तो वह अमेरिका की भू-मंडलीय रणनीति का मील का पत्थर बनाया जा सकता है। अफगानी तालिबान ईरान-इराक, चेचेन्या और पूर्वी तुर्कमेनिस्तान तक असरदार बतलाये जाने लगे हैं। अमेरिका के दूसरे पिट्ठू सउदी अरब से तो उनका नाता जगजाहिर है। कट्टरपंथी इस्लामी ज्वार दक्षिणी फिलिप्पीन, इंडोनिशिया, मलेशिया, दक्षिणी थाईलैंड, बांग्लादेश, नेपाल की तराई हर जगह दिखलाई देता है। अफ्रीका में सूडान भी इससे अछूता नहीं। अमेरिकी सरकार इस बात को भली-भांति जानती है कि उसकी छत्रछाया में बर्बर मनमानी करने वाला इजराइल भी इस्लामी दुनिया में उसके लिए नित नये शत्रु पैदा करता है। अत: झखमार कर उसे सुलह के लिए पेशकश करनी पड़ी है। अमेरिका ने ही वह विचित्र स्थापना की है कि सभी तालिबान बुरे नहीं होते, इनमें स कुछ अच्छे भी होते हैं। इसी सिद्धांत के तहत वह नुस्खा सुझाया गया कि पाकिस्तान के स्वात प्रदेश में शरियत कानून लागू कर दिया जाना चाहिए। पाशविक तालिबानों के इस तरह तुष्टीकरण का एक ही नतीजा सामने आ सकता था और वही सामने आया। बुलंद हौसलों वाले तालिबान ने पेशावर की घेराबंदी कर डाली और उनकी फौजें इस्लामाबाद से सिर्फ साठ-सत्तर किलोमीटर दूर तक पहुंच गई, तब जाकर अमेरिका ने पाकिस्तान पर दबाव डालना शुरू किया। करजई और ज़रदारी दोनों को ही ओबामा ने डांट-फटकार के लिए बुला भेजा। इस घटनाक्रम को हमारे नादान नीतिनिर्धारक भारत के राष्ट्रहित में समझते हैं। यह सोचकर कि इससे पाकिस्तान अपनी फौजें हिन्दुस्तान की सीमा से हटाकर दर्र-ए-खैबर की तरफ पठा देगा। सबसे चिन्ताजनक बात यह है कि सामरिक भू-राजनैतिक हितों के लिए अमेरिका पाकिस्तान की गै़र सैनिक सरकार को कभी भी कुर्बान कर सकता है। इस वक्त भले ही ज़रदारी यह घोषणा सीना तान कर कर रहे हैं कि जनतांत्रिक सरकारें आपस में युद्ध नहीं लड़तीं, उनकी सरकार को जनतांत्रिक मानने वाला वज्र मूर्ख ही समझा जा सकता है। इस बात को भुलाना कठिन है कि अमेरिका की निगाह में भारत की बहुत बड़ी मुस्लिम आबादी हमेशा शक के दायरे में रहेगी। खासकर इसलिए कि भारत वास्तव में एक जनतांत्रिक देश है, जहां अमेरिका के इशारों पर नाचने वाली फौज इस पर अंकुश नहीं लगा सकती। भारत में आमचुनाव के कारण इस समस्या का तटस्थ मूल्यांकन असंभव हो गया है। अल्पसंख्यक अर्थात् मुसलमान मतदाता को नाराज़ करने का खतरा कोई भी राजनैतिक दल नहीं उठा सकता। खुद को धर्मनिरपेक्ष कहने वाली पार्टियों की जान तो और भी बुरी तरह सांसत में फंसी है। अमर सिंह बनाम आजम खान वाला किस्सा इसकी सिर्फ एक मिसाल है। हमारे लिए सबसे बड़ा संकट यह है कि स्वात के बाद कट्टरपंथियों की दकियानूस मांगे कभी भी हमारे जी का जंजाल बन सकती हैं। सिरफिरे या भड॥काये-फुसलाये या खरीदे हुये असामाजिक तत्वों के माध्यम से यह मांग जनतांत्रिक अधिकार के रूप में उठवाई जा सकती है। ऐसी हालत में अफ-पाक का नापाक क्षेत्र लगातार बढ़ सकता है। यह सुझाना तर्कसंगत है कि अमेरिका कभी भी अफ-पाक आकाश का इस्तेमाल शुरू कर सकता है। जम्मू-कश्मीर राज्य में इस बार मतदान में भारी गिरावट अलगाववादियों के बढ़े हौसलों का संकेत हैं। स्वात हमसे बहुत दूर नहीं और इस खूबसूरत घाटी की सरहद पाक अधिकृत कश्मीर को छूती है। यह सब महज इत्तफाक नहीं। श्चह्वह्यद्धश्चद्गह्यद्धश्चड्डठ्ठह्लञ्च द्दद्वड्डन्द्य .ष्oद्व लेखक जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में प्राध्यापक हैं।

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