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दो टूक

कोई अचरज नहीं हुआ! जसवंत सिंह की किताब पर प्रतिबंध पर कोई अचंभा नहीं हुआ! यह वही  मानसिकता तो है जो दीपा मेहता की ‘फायर’ पर या हुसैन की ‘सरस्वती’ पर प्रतिबंध की मांग करती है। जो बात तो युवाओं को नेतृत्व सौंपने की करती है लेकिन जिसमें बहुधर्मिता, खुलापन और विविधता जैसी युवाओं की सबसे पंसदीदा चीजों के लिए कोई जगह नहीं! जो दूसरे मजहबों, दूसरी संस्कृतियों या दूसरे विचारों को देशनिकाला देना चाहती है।

भई किताब अच्छी नहीं तो छोड़ दीजिए! मत पढ़िए! प्रतिबंध ही क्यों? एक पश्चिमी विचारक ने कहा था, ‘मैं आपकी बात से असहमत हो सकता हूं, लेकिन मैं हर कीमत पर आपकी अभिव्यक्ति के अधिकार की रक्षा करूंगा।’ खुद लोकतंत्र भी तो एक दूसरे से असहमत होने की सामूहिक सहमति का नाम है! इत्ती सी बात प्रतिबंध चाहनेवाले क्यों नहीं समझते?

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