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26 जनवरी, 2020|11:25|IST

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कागजों पर ही सिमट कर रह गया वनीकरण

इस बार वन विभाग नहीं पूरे कर पाएगा पौधे लगाने का लक्ष्य। मानसून अच्छी तरह नहीं आया। बामुश्किल 50 प्रतिशत पौधे वन विभाग अभी तक लगा पाया है। इन पौधों में भी आधे बच पाएंगे। जबकि वन विभाग ने इस साल साढ़े पांच लाख पौधे लगाने का लक्ष्य रखा था।

पर्यावरण के खतरों को लेकर परेशान पर्यावरणविदों और लोगों के विचार से नहीं सरकारी वन विभाग का कोई लेना-देना नहीं। पौधे कागजों पर लगते हैं क्योंकि वास्तविकता की धरातल पर लक्ष्य जितने पौधे लगते हों ऐसा नजर नहीं आता। पौधे बच नहीं पाते। सालो साल लाखों पौधे अरावली के वनीकरण के लिए खर्च कर दिए जाते हैं मगर इन पौधे के बड़े होने तक इनका संरक्षण नहीं मिलता। नतीजतन पौधे सूख जाते हैं।

ऐसा माना जाता है कि तीन महीने के मानसूनी मौसम में पौधे को अतिरिक्त पानी दिए जाने की जरूरत नहीं होगी, मगर गुड़गांव में साल दर साल खुलकर मानसून भी नहीं आ रहा। छोटे पौधों के सूखने की संभावना ज्यादा होती है।

लगाए गए प्रति पौधे पर सरकारी खर्च 30 रुपया वार्षिक आता है। इसमें पौधे के लिए नर्सरी तैयार करने,गड्ढा खोदने से लेकर पौधे को पानी देने, उसकी देखभाल, जानवरों से रक्षा और निराई आदि सारे खर्च शामिल हैं। वन विभाग के अधिकारियों के अनुसार एक बार पानी देने में पांच रुपये का खर्च आता है। इस तरह पौधे को अपने जीवनकाल में मात्र छह बार पानी दिया जा सकता है अगर दूसरे खर्च नहीं किए जाएं।

एक पौधे को सप्ताह में कम से कम एक बार पानी की जरूरत होती है। पौधे को लगने के लिए कम से कम 16 बार पानी की जरूरत होती है। जबकि सरकारी खर्च से ज्यादा से ज्यादा दो-तीन बार ही पानी दिया जा सकता है। हर साल जो पौधे लगते हैं, उनमें से कितने पौधे बड़े होने तक बच पाते होंगे इस बात को एक पौधे के लिए किए सालाना खर्च से समझ जा सकता है।

अरावली के आस-पास और दूर दराज के इलाकों में टैंकर से पानी ले जाने के लिए भी ज्यादा खर्च हे। इस बार जो पौधे लगाए गए हैं इनमें तीन बार पानी दिया जा चुका है।

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  • Web Title:लगते हैं लाखों पौधे मगर दिखते नहीं