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अमीर देश ही खाएंगे तो गरीब कहां जाएंगे

अपनी खाद्य सुरक्षा को लेकर चिंतित कई विकसित देश विकासशील देशों में जमीन हथियाने की नई मुहिम चला रहे हैं। इससे दुनियाभर में गंभीर खाद्य संकट पैदा होने की आशंका है। भारत की बात करें तो कमजोर मॉनसून की वजह से इस साल देश का तकरीबन आधा हिस्सा सूखे की गिरफ्त में है। चीनी तथा गेहूं के उत्पादन में भारी कमी के अलावा चावल के उत्पादन में करीब एक करोड़ टन की कमी भावी खाद्य असुरक्षा की भयावह स्थिति को साफ बयान करती है। ऐसे में जनता के लिए खाद्य सुरक्षा का पुख्ता इंतजाम सरकार की पहली प्राथमिकता होनी चाहिए। सरकार ने नया खाद्य सुरक्षा कानून बनाने का वादा भी किया है। इस के लिए की जा रही कवायद का जायज ले रहे हैं हमारे विशेष संवाददाता विजेंद्र रावत

दुनिया के कई देश भीषण खाद्य संकट से गुजर रहे हैं। भूख और कुपोषण के कई भयावह रूप हमें अक्सर विभिन्न संचार माध्यमों के जरिए दिखाई देते हैं। दुनिया के गरीब देशों में यूं तो लोग खाने के लिए अन्न के एक-एक दाने को तरस जाते हैं, लेकिन हालिया सूचनाओं के अनुसार कई अमीर देश अफ्रीका के कई देशों सहित कुछ अन्य स्थानों पर खेती योग्य जमीन खरीद रहे हैं जिससे वह अपनी जनता का पेट भर सकें।

अमेरिकी, भारतीय और इंग्लैंड के विशेषज्ञों की एक रिपोर्ट के अनुसार अभी तक दुनिया भर में तीन करोड़ हैक्टेयर जमीन को अमीर देश अपने शिकंजे में लेने का प्रयास कर रहे हैं। इस तरह की ‘जमीन हथियाने’ की नई मुहिम को ‘नव-उपनिवेशवाद’ की संज्ञा दी जा रही है। बीते दिनों जी8 की बैठक में यह मुद्दा जोर-शोर से उठाया गया था। हाल में संयुक्त राष्ट्र के खाद्य के विशेष दूत ओलिवियर डि शटर ने भी कहा है कि जमीन खरीदने का यह चलन तेजी से बढ़ता जा रहा है। सभी देश के दूसरे की देखा-देखी जमीन खरीदने में लगे हैं।

किस की और कितनी जमीन
अभी तक गरीब अफ्रीकी देशों जैसे कैमरून, इथियोपिया, मेडागास्कर और जम्बिया सहित ब्राजील, यूक्रेन और रूस जैसी उर्वरक भूमि वाले देशों में भी कई देश जमीनें खरीद चुके हैं। गत वर्ष ही कई खाड़ी देशों, स्वीडन, चीन और लीबिया ने जमीनें खरीदीं। इससे स्पष्ट है कि जमीन खरीदने में कई गरीब देश भी आगे हैं। सूडान जैसे देश में, जहां भूख और कुपोषण का सबसे भयावह रूप देखने को मिलता है, अब तक छह देश बड़ी जमीन खरीद चुके हैं।

संयुक्त राष्ट्र के फूड एंड एग्रीकल्चरल ऑर्गेनाइजेशन (एफएओ) और अन्य विश्लेषकों के अनुमान के अनुसार, गत छह माह में करीब दो करोड़ हैक्टेयर (पांच करोड़ एकड़) जमीन बिक चुकी है या लीज पर दी जा चुकी है। सबसे हैरानी की बात ये है कि यह जमीन यूरोप की समूची कृषि योग्य जमीन के लगभग बराबर ही है। गत वर्ष ही करीब एक करोड़ हैक्टेयर जमीन का सौदा हुआ था। इस जमीनी सौदे में सबसे बड़ा सौदा दक्षिण कोरिया ने किया है जिसने सूडान में सात लाख हैक्टेयर जमीन अपने अधीन की है। सऊदी अरब ने तंजनिया में पांच लाख हैक्टेयर जमीन खरीदी है। गौरतलब है कि भारत ने भी 80 कंपनियों को अफ्रीका में तीन लाख पचास हजार हैक्टेयर जमीन खरीदने के लिए वित्तीय सहायता उपलब्ध कराई है।

कुछ विचार
भारत के फोरम फॉर बायोटेक्नोलॉजी एंड फूड सिक्योरिटी के देविंदर शर्मा का कहना है कि अनाज उत्पादन की आउटसोर्सिग से निवेशक राष्ट्र को तो लाभ होगा, लेकिन इस कारण निवेशित देश में भुखमरी और खाद्यान्न की कमी देखने को मिलेगी। उनके अनुसार आधुनिक कृषि विधि से भूमि की उर्वरक शक्ति में कमी, जल स्रोत सूखे और रसायनों से पर्यावरण को नुकसान पहुंचता है। और यह सब समस्याएं निवेशित देश को उठानी पड़ेंगी।
अमेरिका के इंटरनेशनल फूड पॉलिसी रिसर्च इंस्टीटच्यूट के अनुसार इस समय विकसित देशों द्वारा विकासशील देशों में कृषि योग्य जमीन हासिल करने के लिए 20 से 30 अरब डॉलर का निवेश किया जा रहा है।

इस मामले में चिंता इसलिए भी व्यक्त की जा रही है क्योंकि अधिगृहित की जने वाली कृषि भूमि में से अधिकांश के आसपास पानी का अच्छा इंतजम है और बंदरगाह भी निकट ही हैं। लंदन स्थित इंटरनेशनल इंस्टीटच्यूट फॉर एन्वायरनमेंट एंड डिवेलपमेंट की गत माह की रिपोर्ट के अनुसार इन भूमि सौदों से कई खतरे और अवसर उभर कर आते हैं। रिपोर्ट के अनुसार इस तरह का निवेश सकल घरेलु उत्पाद और सरकारी खजानों में बढ़ोतरी तो करेगा ही, साथ ही आर्थिक विकास और जीविकोपाजर्न में भी सहायक साबित होगा। लेकिन इसके कारण स्थानीय लोगों को उन संसाधनों से हाथ धोना पड़ेगा जिस पर वे अपना पेट भरने के लिए निर्भर होते हैं। कई देशों को भीषण खाद्य संकट का भी सामना कर पड़ सकता है।

(गाजिर्यन से साभार)

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