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उनकी ड्रेस नहीं, डिप्लोमेसी देखिए

जब प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह आम जनता के सामने आते हैं तो क्या कोई उनकी पगड़ी के रंग पर ध्यान देता है या टिप्पणी करता है? क्या किसी देश या व्यवसाय के नेता की क्षमता का आकलन उसके पहनावे से किया जा सकता है? इन दोनों सवालों का जवाब स्पष्ट है और यह बहस का विषय होना भी नहीं चाहिए। इसके बावजूद सत्ता के शिखर पर बैठी महिलाएं अपने रूपरंग और पहनावे पर सार्वजनिक रूप से होने वाली चर्चा से बच नहीं पातीं।

अमेरिकी विदेशमंत्री हिलेरी क्लिंटन की हाल की भारत यात्रा पर नजर डालें। यात्रा के दौरान वह एक सप्ताह तक हमारे अखबारों के प्रथम पृष्ठ और टेलीविजन चैनलों पर छाई रहीं। उन्होंने अनेक सरकारी और गैरसरकारी बैठकों में हिस्सा लिया। वह उद्योगपतियों और राजनीतिज्ञों से मिलीं। स्वरोजगार प्राप्त महिलाओं व छात्रों से भी मिलीं। लेकिन हिलेरी क्लिंटन अपने रूपरंग, पहनावे व बालों के बारे में व्यक्तिगत टिप्पणियों से बच नहीं सकीं। एक समाचारपत्र ने तो क्लिंटन के पहनावे पर स्थानीय फैशन डिजाइनरों की राय लेकर पूरा फीचर ही निकाल डाला।

भारत यात्रा के पहले दिन हिलेरी क्लिंटन ने मुंबई के प्रसिद्ध उद्योगपतियों के साथ सुबह के नाश्ते पर बातचीत की। अखबारों में जब इसकी खबर छपी तो शीर्षक क्या था? क्लिंटन के लाल बिजनेस सूट को फैशन से जोड़ दिया गया। बैठक की खबर ऐसे शुरू हुई:- ‘‘उनके छोटे कटे हुए बाल सफाई से पीछे बंधे हुए थे जिनका उनके पहनावे से मेल था।’’

व्यक्तिगत टिप्पणियां एक ऐसी बाधा है, जिसका सामना सार्वजनिक जीवन जी रही ज्यादातर महिलाओं को करना पड़ता है। हिलेरी क्लिंटन को अपने रूपरंग, व्यक्तित्व, बोलने के अंदाज आदि को लेकर तब भी बहुत कुछ सुनना पड़ा था, जब वह देश की प्रथम महिला थीं और उनके पति बिल क्लिंटन अमेरिका के राष्ट्रपति। हाल ही में जब वह राष्ट्रपति पद के चुनाव के लिए डेमोक्रेटिक पार्टी की प्रत्याशी बनने के लिए चुनाव लड़ रही थीं, तब भी उन पर व्यक्तिगत छींटाकशी की गई। मीडिया ने उन पर जिस ढंग से हमला किया, उसके बाद लगता है कि वह इन सब बातों की अभ्यस्त हो गई हैं।

‘‘वाए वूमन शुड रुल द वर्ल्ड ’’ नामक मनोरंजक पुस्तक में क्लिंटन के समय व्हाइट हाउस में प्रेस सचिव रही डी. डी. मायर्स ने हिलेरी के रूपरंग का वर्णन इस प्रकार किया है:- ‘‘ एक दशक से भी अधिक समय से उनका (हिलेरी) व्यक्तित्व राष्ट्रीय बातचीत का विषय बना हुआ है। उन्हें पैंट पहननी चाहिए, स्कर्ट नहीं। उनके बाल बहुत लंबे हैं, नहीं, यह बहुत छोटे हैं। उनका गाउन बहुत दकियानूसी है ..। ’’

सुश्री मायर्स ने भी अपने कार्यकाल के शुरू के कुछ सप्ताह में इस तरह की बातें सुनीं। वह लिखती हैं- ‘‘जिस समय मैं क्लिंटन के प्रचार अभियान से जुड़ी, मेरे बारे में लिखी लगभग हर खबर में मेरे बालों, मेरे कान के टाप्स, मेरे मेकअप, मेरे कपड़ों, मेरे कोट के बारे में वर्णन होता था। ’’ जब वह व्हाइट हाउस में प्रेस सचिव बनी तो उन पर और पैनी नजर पड़ने लगी।

अक्सर यह उम्मीद की जाती है कि महिलाएं ऐसी बातों पर प्रसन्न होंगी और उन्हें यह सब अच्छा लगेगा। लेकिन ऐसी टीका-टिप्पणी खिजाने वाली और बहुत अपमानजनक होती हैं। जो महिलाएं प्रमुख पदों पर पहुंचती हैं, वे पुरुषों की तरह मेहनत करती हैं। लेकिन जब वे शीर्ष पर पहुंच जाती हैं तो वे वहां तक कैसे पहुंचीं, इस बारे में उन्हें अफवाहों का सामना करना पड़ता है। उनकी सार्वजनिक छवि को चोट पहुंचाने के प्रयास किए जाते हैं। अगर ऐसा एक या दो बार हो तो इसे नजरअंदाज किया जा सकता है, लेकिन जब बार-बार हो तो लगता है कि कुछ गड़बड़ है।

भारत में पदानुक्रम के कारण देश की शक्तिशाली महिलाओं के रूपरंग या पहनावे को लेकर इस तरह की टिप्पणियां बहुत कम होती हैं। उदाहरण के लिए सोनिया गांधी को लेकर लिखी गई किसी भी खबर में कोई व्यक्तिगत संदर्भ नहीं होता। कपड़ों के बारे में अपनी पसंद और हैंड बैग को लेकर मायावती को निशाना अवश्य बनाया गया, लेकिन उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री के बारे में लिखी जाने वाली खबरों में इसका उल्लेख नहीं हुआ। यहां तक कि व्यवसाय के क्षेत्र में उच्च पदों पर बैठी महिलाएं भी व्यक्तिगत टिप्पणियों से बची रहती हैं। इसका कारण यह नहीं है कि भारत का मीडिया महिलाओं के प्रति संवेदनशील है, बल्कि इसलिए है कि वह पद और शक्ति के प्रति सर्तक रहता है।

मेरा मानना है कि भारत की महिला नेत्री भाग्यशाली हैं, क्योंकि वे व्यक्तिगत छींटाकशी से बची हुई हैं। जब मीरा कुमार को पन्द्रहवीं लोकसभा की अध्यक्ष चुना गया तो यह जानने कि उत्सुकता थी कि मीडिया उनके काम के बारे में खबर कैसे लिखेगा। शुक्र है कि ऐसी कोई खबर नहीं थी कि लोकसभा अध्यक्ष पद संभालने के बाद पहले दिन वह कैसे कपड़े पहने थीं। लेकिन भारत की पहली महिला लोकसभा अध्यक्ष ने सुचारू रूप से सदन चलाने की अपनी काबलियत से न केवल पक्ष-विपक्ष के सांसदों, बल्कि मीडिया को भी हैरानी में डाल दिया। तीन अगस्त को एक राष्ट्रीय दैनिक में छपी खबर का शीर्षक था- ‘‘व्यवस्थित सदन, मीरा को धन्यवाद।’’ इसमें लिखा था कि लोकसभा के बजट सत्र के दौरान मीरा कुमार बेकाबू सांसदों को कितने प्रभावशाली ढंग से नियंत्रण में रख पाईं। लोकसभा के पूर्व अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी से उनकी तुलना करते हुए संवाददाता लिखता है- ‘‘मीरा धीमी आवाज में तर्कसंगत ढंग से अपनी बात कहती हैं और रास्ता निकल आता है। संक्षेप में कहें तो शुरू में उनकी कोमलता और कम बोलना उनकी कमजोरी समझी जा रही थी, जो वास्तव में उनकी शक्ति साबित हुई। उनकी इस विशिष्टता को सांसदों या मीडिया ने पहले क्यों नहीं पहचाना? क्या पुरुषवादी होने के कारण?

अच्छा सवाल है। लेकिन इस संवाददाता ने कोमलता, मधुर आवाज और नरम व्यवहार जैसी उनकी जो विशेषता बताई हैं, वे मीरा कुमार की सफलता का कारण नहीं। उनकी सफलता का कारण बातचीत की योग्यता, शांति कायम रखना, बीच का रास्ता ढूंढना, समझना और संयम रखना है। यह गुण प्राकृतिक रूप से पुरुषों या महिलाओं में नहीं आते। मुझे लगता है कि महिलाओं में ये गुण ज्यादा होते हैं, क्योंकि रोजमर्रा की जिंदगी में वे इनका अधिक प्रयोग करती हैं। उनकी आवाज कैसी है या वे कैसे कपड़े पहनती हैं, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। फर्क इससे पड़ता है कि वे अपने काम को कैसे अंजाम देती हैं।

kalpu.sharma@gmail.co
लेखिका स्वतंत्र पत्रकार हैं

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