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हर पेट को भोजन के लिए बनेगा ‘खाद्य सुरक्षा कानून’

केन्द्र सरकार का प्रस्तावित खाद्य सुरक्षा कानून पास हुआ तो आने वाले समय में अकालग्रस्त आदिवासी, पहाड़ी तथा कठिन रेगिस्तानी क्षेत्रों के गरीबों को भूखे पेट नहीं सोना पड़ेगा। तब कालाहांडी (उड़ीसा) से भूख से बिलखती मां को अपने जिगर के टुकड़े को 50 रुपये में बेचने के लिए मजबूर नहीं होना पड़ेगा और न ही कोई टीवी चैनल बुंदेलखंड के किसी गांव में रोटी की जगह घास खाती बूढ़ी मां के हृदय विदारक दृश्य दिखा सकेगा, जो पूरे समाज को शर्मसार करते हैं।

बासठ साल के आजाद देश में पहली बार भूख से आजादी के लिए प्रस्तावित खाद्य सुरक्षा कानून बनाने की कवायत एक शुभ संकेत है, पर क्या भारत के ऊबड़-खाबड़ व कंटीले रास्ते से यह खाद्य सुरक्षा उस गरीब की झोपड़ी तक पहुंच सकेगी जो बाढ़ में डूबने के डर से अपना थोड़ा बहुत कीमती सामान भी गठरी में लपेट कर गांव के महाजन या सरपंच के घर रख आता है और गरीबी तथा नरेगा के कार्ड भी उसी के पास रहते हैं। गरीब सिर्फ कमरतोड़ मेहनत करता है और बाकी की जिम्मेदारी यही महाजन व सरकारी कारिंदे उठाते हैं और तब सरकारी मदद का 15 प्रतिशत हिस्सा ही उस तक पहुंचता है। यूपीए सरकार की राष्ट्रीय रोजगार गांरटी अधिनियम  (नरेगा) के कानून बन जने के बाद नि:शुल्क व अनिवार्य प्राथमिक शिक्षा अधिनियम पर संसद की मोहर लगने के बाद सरकार अब हर पेट को भोजन की गांरटी के लिए खाद्य सुरक्षा कानून के मसौदे पर तेजी से मंथन कर रही है।

प्रस्तावित खाद्य सुरक्षा कानून के अनुसार गरीबी रेखा के नीचे जीने वाले हर परिवार को तीन रुपये प्रति किलो की दर से 25 किलो अनाज (गेंहू या चावल) हर माह मुहैया कराया जाएगा ताकि देश में कोई भी भूखा न सोए। दूसरी बार सत्ता में आने वाली कांग्रेस ने नरेगा के माध्यम से शायद ग्रामीण भारत की ताकत पहचान ली। गांव की चौपालों पर रोजगार गारंटी की ऐसी चर्चा छिड़ी कि कांग्रेस की झोली में गांव वालों के खूब वोट गिरे।
यही कारण है कि लोकसभा चुनाव में खाद्य सुरक्षा का वादा करने वाली कांग्रेस ने सत्ता संभालते ही अपने वादे पर अमल करना शुरू कर दिया। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने दूसरी बार सत्ता में आते ही 12 जून को यूपीए सरकार से खाद्य सुरक्षा पर विधेयक का मसौदा बनाने की मांग की। उनकी इस मांग को सरकार ने आदेश के रूप में लिया और इस पर तेजी से काम शुरु हुआ। विधेयक को अमली जामा पहनाने के लिए वित्तमंत्री प्रणब मुखर्जी की अध्यक्षता में मंत्रियों का एक समूह गठित किया गया है। विधेयक का मसौदा राज्य सरकारों को भी भेजा जा चुका है।

इस कानून को अमल करने में आने वाली सबसे बड़ी दिक्कत गरीबी रेखा के नीचे रहने वाले परिवारों की संख्या है। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का कहना है कि राज्य सरकार ने गरीबी रेखा के नीचे जीने वाले डेढ़ करोड़ परिवारों को चिह्न्ति किया और उन्हें राज्य सरकार द्वारा दी जाने वाली सुविधाएं भी मुहैया कराई जा रही हैं, जबकि केंद्र सरकार के मानदंडों के अनुसार राज्य में गरीबी रेखा के नीचे जीने वाले परिवारों की संख्या मात्र 61 लाख है। अब अगर केंद्र अपने द्वारा चिह्न्ति परिवारों को ही खाद्य सुरक्षा के अंतर्गत लाती है तो राज्य के बाकी गरीब परिवार क्या इस सुविधा से वंचित रहेंगे? यह स्थिति बिहार की ही नहीं कमोबेश सभी राज्यों की है।

सोमवार को खाद्य सुरक्षा अधिनियम पर वित्तमंत्री प्रणब मुखर्जी की अध्यक्षता में गठित मंत्री समूह की पहली बैठक हुई। इसमें चर्चा हुई कि आखिर खाद्य सुरक्षित परिवार किसे माना जाए ? सरकार के सामने 2000 में शुरू हुई अंत्योदय अन्न योजना भी है जिसके तहत हर अंत्योदय परिवार को 2 रुपये किलो गेहूं तथा 3 रुपये किलो चावल, 35 किलो प्रतिमाह दिया जाता है। खाद्य सुरक्षा कानून के बाद यह योजना जारी रहेगी या इसमें समाहित हो जाएगी।

यदि यह योजना बंद होती है तो इन परिवारों को कम अनाज के लिए ज्यादा पैसा भरना पड़ेगा। इस बात पर भी चर्चा हुई कि इस कानून के तहत गरीबों को सार्वजनिक वितरण प्रणाली  के तहत राशन दिया जाए या उन्हें नकद भुगतान किया जाए। गरीबों को चिह्न्ति करने के लिए एक पारदर्शी तरीका अपनाया जाए। फिलहाल इस कानून को अमली जामी पहनाने में अभी कई पेंच हैं। इधर मसौदे पर काम कर रहे योजना आयोग ने कुछ सवाल मंत्रिमंडलीय समूह के सामने रखे हैं।

आयोग ने कहा है कि इस खाद्य सुरक्षा के अंतर्गत कितने परिवार आएंगे जबकि केन्द्र तथा राज्यों की सूची में भारी अंतर है। कृषि मंत्री शरद पवार का कहना है कि सूखा तथा देश की भौगोलिक परिस्थितियों को देखते हुए खाद्य सुरक्षा कानून का सही अमल बेहद कठिन जरूर है पर असंभव नहीं। इससे पूर्व बने रोजगार गारंटी कानून में पचास खामियों के बावजूद गांवों से मजदूरों के पलायन पर काफी रोक लगी है। इसी तरह खाद्य सुरक्षा कानून बनने से भूख से लड़ाई का पहला पड़ाव तो हम जीत ही जाएंगे।

खाद्य असुरक्षा कानून है यह
राज्यसभा सांसद बृंदा करात ने प्रस्तावित खाद्य सुरक्षा कानून को खाद्य असुरक्षा कानून की संज्ञा दी है। उनका कहना है कि वे खाद्य सुरक्षा कानून के हक में हैं पर जिस तरह से इस विधेयक को बनाया जा रहा है उससे गरीबों को लाभ के बजाए नुकसान ज्यादा होगा। उन्होंने कहा कि इस प्रस्तावित कानून के अनुसार हर गरीब परिवार को तीन रुपये प्रति किलो का दर से 25 किलो अनाज का प्रावधान किया जा रहा है जबकि कई राज्य सरकारें अंत्योदय योजना के अंतर्गत प्रत्येक परिवार को 2 रुपये प्रति किलो की दर से 35 किलो प्रतिमाह अनाज पहले ही दे रहे हैं तो क्या केन्द्र उन परिवारों को 10 किलो कम कर उनसे एक रुपया प्रति किलो ज्यादा कीमत वसूल करेगा?

उनका कहना है कि केन्द्र अभी करीब 12 रुपये दैनिक आय वाले लोगों को ही गरीब मानती है इसलिए जो इससे ज्यादा कमाते हैं वे इस लाभ से वंचित रहेंगे। जब सौ रुपये किलो दाल तथा मोटा चावल भी 20-25 रुपये प्रति किलो है, ऐसे में 15 रुपये कमाने वाले को गरीब न मानना गरीबों का मजाक ही है। उन्होंने बताया कि माकपा 26 अगस्त को खाद्य सुरक्षा पर चर्चा करेगी और इस पर पार्टी अपनी रणनीति तय करेगी।

देश भर में पंचायत स्तर पर हो खाद्य भंडारण
यूपीए की पूर्व सरकार में ग्रामीण विकास मंत्री रहे डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी (नरेगा) के शिल्पकार माने जाते हैं। वे खाद्य सुरक्षा कानून के समर्थक हैं, पर इसके लिए गंभीर जमीनी तैयारी के पक्ष में हैं। उनके अनुसार इस कानून को जमीन पर उतारने के लिए सरकारी मशीनरी तथा आम लोगों में जिम्मेदारी, जवाबदारी, भागीदारी तथा जानकारी होनी जरूरी है।

योजना की पारदर्शिता जमीनी स्तर पर होनी जरूरी है। उन्होंने नरेगा में देखा है कि जहां लोगों में जितनी ज्यादा जागरूकता है, वहां योजना उतनी ज्यादा सफल हो रही है। उन्होंने कहा कि गरीबों के चयन में पारदर्शी मापदंड अपनाये जाने चाहिए तथा हर ग्राम सभा, ब्लाक, जिला व राज्यस्तर पर यह सूची सार्वजनिक होनी चाहिए। गरीबों के चयन के लिए ग्राम सभा की बैठक हो जिसमें सार्वजनिक ढंग से चयन प्रक्रिया को अमली जमा पहनाया जाये। खाद्य सुरक्षा के लिए जरूरी है कि हर ग्राम पंचायत स्तर पर भंडारण की व्यवस्था हो ताकि बाढ़ व अन्य आपदा के समय गरीबों को आसमान न ताकना पड़े।

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