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हमारी उत्पादन क्षमता

अपनी शस्य-श्यामला वसुंधरा, जैसा कि मनुष्य ही नहीं, देवताओं द्वारा भी चिर सत्यापित है, अति उर्वरा है। इतनी अधिक उत्पादनकारी कि कभी-कभार बीज डाले बिना भी फसलें उग आया करती हैं। किधर से कब, क्या और कौन पैदा हो जाए, इसका अनुमान लगाना असंभव है। पैदा करने के मोरचे पर हमारा जवाब नहीं है। हमारी इस उत्पादन-क्षमता का लोहा सारी दुनिया मानती है।

चूंकि अपनी जमीन उपजाऊ है और जलवायु भी लगभग-लगभग अनुकूल है, इसके चलते दो चीजें, जिन्हें बच्चे और समस्याएं कहा जाता है-बहुतायत में, या यूं समझ लें कि नॉन स्टॉप जन्म लेती रहती हैं। बच्चों की समस्या और समस्याओं के बच्चों से हम निरंतर जूझते ही रहते हैं। इन दोनों की कौन कहे, महंगाई, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, गरीबी, आतंकवाद, हिंसा और नंगई, इन सभी के फलने-फूलने के उपकरण भी अपने मुल्क में मौजूद हैं। आज महंगाई की अमर बेल आकाश छू रही है। भ्रष्टाचार की अनगिनत लताएं आम से लेकर खास आदमी के शरीर से लिपटी-चिपटी उपलब्ध हैं। गरीबी की झड़ी गांव-गांव में जड़ जमाए हुए है। इस झड़ी को जितना छांटो, उतना फैलती जाती है। हिंसा के कैक्टस और नंगई के बेंत समाज के खेतों में लहलहा रहे हैं। इन्हें अपराधी हवा देते हैं। राजनीतिज्ञ सींचते हैं। पुलिस जन निराई-गुड़ाई करते हैं। इतने पर भी कमी पड़ जाए तो उर्वरक की जगह आम जनता का उपयोग किया जाता है। जिसे आम जनता कहा जाता है, वह यों भी गोबर गणेश होती है। जब से आजादी मिली है, इसकी धरती की जुताई राजनीति के ट्रैक्टरों के जरिए चालू है। इन ट्रैक्टरों ने परती जमीनें तक जोत मारीं। हमारे खेतों में विदेशी बीज तो पहले से ही पड़े हुए थे, देसी बीजों की तमाम प्रजातियों की बुआई भी समांतर तरीके से की जाने लगी। फसलें दलों की शक्लों में उगने लगीं। पार्टियों से पार्टियां उपजने लगीं। नेता जनता को रिझा रहे हैं। देखो, तुम कितना आत्म निर्भर हो गए हो! अपना राज। अपनी जमीन। अपनी फसल। तुम बोया करो। हम काटकर अपने घर ले जाएंगे।

इस उपजाऊ धरती पर हर किसी को पनपने की छूट हासिल है। हमारी अपनी विधियां हैं। जब हम यह देखते हैं कि सूखे के मौसम में भी घोटाला, फर्जीवाड़ा के मेड़ों में आबद्घ खेतों में धनोत्पादन हो रहा है, तो हमें अपनी उत्पादन क्षमता पर बलि-बलि जाने को बरबस जी करने लगता है।

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