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रोजों का महत्व

कुरआन शरीफ में अल्लाह ताला फरमाता है कि ‘ऐ ईमान वालो! तुम पर रोजे फर्जा किए गए जैसा कि तुम से पहली उम्मतों पर फर्जा किए गए, अजब नहीं कि तुम परहेजगार बन जओ।’ इस्लाम के पांच स्तम्भों में तीसरा स्थान रोजे का है। यह 10 शाबान 2 हिजरी को मदीना में फर्जा हुआ। लेकिन जैसा कि कुरआन में बताया गया है, से मालूम होता है कि रोजे की शुरुआत दुनिया में पहले नबी (दूत) हजरत आदम अल्लैहस्सलाम के समय से ही हो गई थी। आप के समय में हर महीने की 13, 14 और 15 तारीख को रोजे फर्जा थे। हजरत नूह अल्लैहस्सलाम ज्यादातर रोजा रखते थे, हजरत दाऊद अल्लैहस्सलाम एक दिन छोड़ एक दिन रोजा रखते थे और हजरत ईसा अल्लैहस्सलाम एक दिन रोजा रखते और दो दिन नहीं रखते। तब से लेकर अंतिम दूत हजरत मोहम्मद सल्ल. तक हर कौम व मिल्लत में रोजे का वजूद किसी न किसी शक्ल में रहा। यहूदी आशुरा का रोजा रखते थे। आप सल्ल. ने उनकी नकल करने से मना करते हुए फरमाया कि वह एक रोजा रखते थे तो तुम दो रोजे रखा करो। आखिरी नबी की उम्मत रमजान में एक महीने के रोजे फर्जा हैं लेकिन यदि किसी ने जानबूझ कर रोजा नहीं रखा तो वह गुनहगार है और बदले में यदि वह जिंदगी भर रोजा रखे तो उस छोड़े एक रोजे का भी विकल्प नहीं हो सकता। कुरआन रमजान के महीने में अवतरित हुआ, इसलिए रमजान का अत्यधिक महत्व है। यह एक ऐसी इबादत है, जो नमाज, हज अथवा जाकात की तरह दिखाई नहीं पड़ती है। दिखाई न देने और केवल अल्लाह से डरते हुए रोजा रखने का पुण्य भी अल्लाह के समीप बेहिसाब है। वह कहता है कि रोजा सिर्फ मेरे लिए है और मैं ही उसका पुण्य दूंगा। यदि इंसान चाहे तो वह छुप कर कुछ भी खा पी सकता है, बंद कमरे में उसे कोई नहीं देख रहा है, लेकिन उसका ईमान यही है कि कोई देखे या न देखे अल्हाह तो देख रहा है। बंदे की यह अदा ही अल्लाह को बहुत प्रिय है। इसीलिए वह इसका विशेष पुण्य भी देता है। रमजान के रोजों में यात्री को इस हद तक छूट दी गई है कि वह  बीमार है तो वह बीमारी से छुटकारा पाने के बाद अपने रोजों की गिनती पूरी कर ले।

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