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नेपाल से नजदीकी

नेपाल का राजनीतिक संक्रमण भारत से उसके नजदीकी रिश्तों के मार्ग में बाधा बन रहा है। यह बात हाल में हुए नेपाली प्रधानमंत्री माधव कुमार नेपाल के भारत दौरे में साफ हो गई है। माधव कुमार ने भारत से राजनीतिक और व्यापारिक संबंधों को नया रूप देने के लिए वार्ताएं कीं और व्यापारियों को भी आश्वासन दिया, लेकिन घरेलू राजनीति की मजबूरियों के चलते किसी एजंडे को ठोस रूप नहीं दे सके। वे 1950 की भारत-नेपाल संधि की समीक्षा चाहते थे, पंचेश्वर परियोजना पर जल्दी संधि चाहते थे, तो भारत उनसे प्रत्यर्पण संधि और व्यापारिक समझौता चाहता था। लेकिन इन मसलों पर किसी संधि को अंतिम रूप देने से पहले माधव कुमार अपनी सरकार के सहयोगी दलों की आम सहमति लेना भी जरूरी समझते थे। दरअसल, नेपाल की संविधान सभा जब तक नया संविधान तैयार नहीं कर लेती और वहां की शांति प्रक्रिया पूरी नहीं हो जाती,  तब तक कई पार्टियों के सहयोग से चल रही एमाले के नेतृत्व वाली यह सरकार कोई नया और रेडिकल फैसला नहीं ले सकती। भारत से किसी विशेष नजदीकी का विरोध वहां के माओवादी तो कर ही रहे हैं, लेकिन माधव मंत्रिमंडल के सहयोगियों में भी बेहतर तालमेल नहीं है। इसका सबसे बड़ा प्रमाण स्वयं उनकी विदेशमंत्री सुजाता कोइराला हैं, जो भारत आने वाले सरकारी प्रतिनिधिमंडल में नहीं शामिल हुईं। प्रधानमंत्री माधव ने भारतीय व्यापारियों को आत्मीय और सुरक्षित माहौल देने का उसी तरह भरोसा दिया है, जिस तरह पिछले प्रधानमंत्री प्रचंड देकर गए थे। इसके बावजूद वहां भारतीय व्यापारियों को धमकाने और उनसे फिरौती वसूलने की शिकायतें जारी हैं। जबकि नेपाल में अभी भी 43 प्रतिशत निवेश भारत का ही है। भारत और नेपाल के बीच व्यापार संधि करने के मार्ग में वे देश आड़े आ रहे है जो उसे अपने व्यापार को बढ़ावा देने का मुख्य अड्डा बनाना चाहते हैं। नेपाल के रास्ते आ रहे आतंकियों और नकली नोटों का धंधा भी भारत के लिए हानिकारक है और प्रत्यर्पण संधि उसके लिए आवश्यक है। बेहतर संबंधों में आ रही इन अड़चनों की वजह नेपाल की राजनीतिक अस्थिरता तो है, लेकिन अब वहां की सरकार भारत के लिए उतनी उदासीन नहीं है, जितनी पहले थी। इसलिए भारत को नेपाल से राजनीतिक और व्यापारिक नजदीकी बढ़ाने की बड़ी पहल भी करनी चाहिए।

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  • Web Title:नेपाल से नजदीकी