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उस्ताद बनेंगे ऐसे

उस्ताद बनेंगे ऐसे

स्कूल में वाद-विवाद प्रतियोगिता का आयोजन होना है। उसमें कक्षा के सभी बच्चों की भागीदारी जरूरी है। बस, इसी बात को लेकर काफी परेशान है चिंटू। सातवीं कक्षा में पढ़ने वाला यह छात्र संकोची जो है। प्रतियोगिता में हिस्सा लेना तो दूर, वह अपने साथियों से खुल कर गपशप तक नहीं करता। अकेला चिंटू ऐसा नहीं है, तुम में से बहुत से ऐसे होंगे, जो कुछ भी कहने में कतराते हैं। क्यों तुम हमेशा बातचीत से दूर रहो, जब  उपाय हैं मौजूद।

भाषा पर पकड़ न रहे कमजोर
क्या तुम कक्षा में जानकारी होने के बावजूद, जवाब देने में हमेशा पीछे रहते हो। कहीं किसी भाषा विशेष की अच्छी जानकारी की कमी से तो तुम आत्मविश्वास नहीं खो देते हो। दोस्तो, भाषा समृद्ध नहीं होगी तो बोलते वक्त तुम्हें हमेशा डर लगेगा कि कहीं कोई गलती न कर बैठो। शायद सामने वाले पर वह प्रभाव भी न पड़ पाए, जो उस वक्त बेहद जरूरी है। शब्दों के पर्यायवाची पर ध्यान देना शुरू कर देना चाहिए। खुद का अपना शब्दकोष तैयार करो, जहां भी किसी शब्द का पर्यायवाची मिले, उसे तुरंत नोट कर लो। हर रोज एक बार उस पर एक नजर जरूर दौड़ाओ, ताकि वे मौके पर याद आ सकें। तुम्हें घर या स्कूल में समाचार पत्र-पत्रिकाएं पढ़ने का मौका जरूर मिलता होगा। लिखे हुए शब्दों व वाक्यों को ध्यान से पढ़ो। अपने खास दोस्तों के साथ नियम भी बना सकते हो कि एक समय में एक ही भाषा का इस्तेमाल करेंगे और गलती करने वाले को तुरंत टोकेंगे।

हमेशा भाषा के हिंग्लिश होने से बचना तुम्हारी तैयारी को और अधिक मजबूत बनाएगा, दूसरी भाषाओं के अच्छे प्रभावशाली शब्दों को अपनाने में संकोच मत करो। जैसे तुम हिन्दी में बात कर रहे हो और तुम्हारी जानकारी में उर्दू के चर्चित शब्द हैं तो उन्हें भी अपनाओ। अगर तुम्हें किसी शब्द का अर्थ नहीं मालूम तो शब्दकोष का इस्तेमाल करने में आलसी मत बनो। अच्छे शब्दकोषों को अपनी लाइब्रेरी में शामिल करने में कभी पीछे नहीं रहना चाहिए। अगर तुम कंप्यूटर के भी अच्छे जानकार हो तो वहां भी इंटरनेट पर विभिन्न शब्दकोषों का भंडार है।

सही उच्चरण पर भी रहे ध्यान
दोस्तो, क्या तुम भी पीत्जा को पिज्जा, सफल को सफ़ल और क्रैश को क्रैच बोलते हो। कई बार न चाहते हुए भी जुबान पर गलत शब्द ऐसे चढ़ जाते हैं कि वे उतरने का नाम ही नहीं लेते। तुम में भी बहुत से ऐसे बच्चे होगे, जो ‘स’ ‘श’ के उच्चरण गलत करते होंगे और सोचते होंगे कि यही सही है। अच्छी बातचीत के लिए हमेशा उच्चरण का ध्यान रखना होता है। सही उच्चरण के लिए शब्दों को हमेशा चबा कर बोलने से गलती की संभावनाएं उतनी ही कम होंगी।
 
मॉक टैस्ट का आयोजन
आजकल ग्रुप डिस्कशन हर जगह अपनाया जाता है। वहां देखा जाता है कि कौन कितनी अर्थपूर्ण वाक कला में निपुण है। आगे चल कर अगर तुम्हारा सपना एनडीए जैसी परिक्षाओं से में बैठने का मन है तो जान लो कि तुम्हें अभी से बातचीत का हुनर सीखना ही होगा। किसी जानकार बड़े की मदद से मॉक टैस्ट का आयोजन नियमित रूप से करवाओ। इसके लिए अपने दोस्तों का ग्रुप तैयार करो और उसकी तैयारी में जुट जाओ। इससे फायदा यह होगा कि तुम्हें लगातार अपनी कमजोरियां पता चलती रहेंगी और दूसरी बार उन पर काम करके तुम मॉक टैस्ट के लिए पहुंचोगे। अधिकतर ग्रुप डिस्कशन में प्रतियोगी एक दूसरे का मुंह ताकते रहते हैं कि आखिर शुरुआत कौन करे, इसलिए हमेशा पहल की कोशिश करो।

अच्छे श्रोता भी बनें
अच्छे वक्ता का पहला गुण ही यही होता है कि वह एक अच्छा श्रोता भी होता है। दूसरों की बेवजह बातों को काटने की आदत से हमेशा दूर रहो। अच्छा श्रोता हमेशा अपनी बारी का इंतजार करता है और दूसरों को भी बोलने का बराबर मौका देता है। कई दफा ऐसा होता है कि सामने वाला वह बात बोलने ही वाला होता कि जिसके लिए तुम सवाल उठा रहे होते हो, तभी तुम उसे टोक कर अपनी किरकिरी करवा बैठते हो। दोस्तो, अगर तुमने अच्छे वक्ता बनने की ठान ली है तो दूसरों की इस कला को भी बारीकी से परखो और जो तरीका प्रभावशाली लगे, उसे अपनाते हुए आगे बढ़ते चलो।

आवाज साफ सुनाई भी दे
क्या जब तुम बोलते हो तो सामने वाले व्यक्ति को तुम्हारी आवाज साफ-साफ सुनाई देती है या क्या लोग बार-बार बात को दोहराने का आग्रह करते हैं। हो सकता है तुम्हारी आवाज स्पष्ट सुनाई न देती हो। अधिकतर मामलों में हमें खुद पता नहीं चल पाता कि परेशानी कहां आ रही है। बेहतर यही होगा कि रिकॉर्डर में अपनी आवाज को टेप करो और फिर सुनो। सुन कर तुम्हें यह पता चल जाएगा कि कहां-कहां समझने में दिक्कतें आ रही हैं। बार-बार इसी प्रक्रिया को दोहराने से एकदम साफ बोलने की कला तुम विकसित कर लोगे। जिस गांव, कस्बे या शहर में हम रहते हैं, वहां का आंचलिक प्रभाव हमारी भाषा में खुद-ब-खुद आ जाता है। दूसरी भाषा बोलते समय स्थानीय भाषा का असर कम से कम आए, इसके लिए भी कोशिश करते रहो।

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