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‘लोकतांत्रिक व्यवस्था पर पुनर्विचार का वक्त’

भारतीय संविधान के लचीलापन का फायदा उठाने की मानसिकता की वजह से व्यवस्थापिका एवं कार्यपालिका के संबंध प्रभावित हुए हैं। संविधान की मूल भावना से हटकर सत्ता लोभ के कारण राष्ट्रीय मानक की अवधारणा समाप्त होती जा रही है। समय आ गया है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था व दिशा पर पुर्नविचार किया जाए। उक्त विचार सेंट्रल बार एसोसिएशन सभागार में आयोजित ‘कार्यपालिका-विधायिका के बीच बेहतर संबंध’ संगोष्ठी में वक्ताओं ने व्यक्त किए।
मुख्य अतिथि यूपी बार कौंसिल के उपाध्यक्ष हरिशंकर सिंह रहे। संगोष्ठी में वक्ताओं ने कहा कि वर्तमान में कार्यपालिका केवल व्यवस्थापिका की चाटुकारिता में व्यस्त है। यही कारण है कि लोकतांत्रिक मूल्यों का दिनों-दिन ह्रास हो रहा है। सांसदों एवं विधायकों के शैक्षणिक योग्यता का निर्धारण तथा अक्षमता पर उन्हें वापस बुलाने का अधिकार जनता के पास होना चाहिए।

तभी देश में सही लोकतांत्रिक मूल्यों की स्थापना हो सकेगी। वक्ताओं ने कार्यपालिका व व्यवस्थापिका के बीच वचनबद्धता की अनिवार्यता पर जोर दिया। कहा गया कि अब समय आ गया है कि विगत छह दशकों के दौरान भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था की दशा-दिशा पर पुनर्विचार किया जाए। बुद्धजीवी वर्ग को यह देखना चाहिए कि संविधान के तहत कार्य हो रहा है या नहीं?

संगोष्ठी में सुरेश श्रीवास्तव, हाईकोर्ट के अधिवक्ता एनएपीएन गिरी, श्रीमती सरोज गिरी, महेन्द्र सिंह, मान बहादुर सिंह, अशोक सिंह, अवधेश सिंह, अशोक सिंह प्रिंस, विजय शंकर श्रीवास्तव, अजरुन पाठक आदि अधिवक्ताओं ने अपने विचार व्यक्त किए। संचालन बार के महामंत्री प्रभाशंकर मिश्र एवं विजय कुमार शर्मा ने किया।

 

 

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  • Web Title:‘कार्यपालिका-विधायिका के बीच बेहतर संबंध’ संगोष्ठी