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भारत-पाक शांति वार्ताओं की उलझन

भारत-पाकिस्तान के संबंधों में सुधार की किसी भी कोशिश के बारे में बढ़-चढ़कर बखान किया जाता है। हर बार जब दोनों देश बातचीत के लिए आगे आते हैं तो इसे रिश्तों की नई शुरूआत कहा जाता है। इसलिए तब भी यही हुआ, जब शर्म अल शेख में दोनों देशों के प्रधानमंत्री मिले। लेकिन यह ऐसा सिलसिला है, जिसकी कोई मंजिल नहीं है, इसलिए बात ज्यादा नहीं बढ़ी। ऐसे बहुत से कारण जो हाल के वर्षो में भारत और पाकिस्तान को बातचीत की मेज पर ले आते हैं। 11 सितंबर और 26 नवंबर के बाद अंतरराष्ट्रीय और क्षेत्रीय माहौल काफी बदल गया है।

अब आतंकवाद को इस्तेमाल विदेश नीति के तौर पर करने को बर्दाश्त नहीं किया जाता। खासकर अमेरिका पाकिस्तान पर लगातार यह दबाव बना रहा है कि वह कश्मीर मसले पर आतंकवादियों को समर्थन देना बंद करे। हांलांकि यह दबाव उतना नहीं है, जितना कि भारत में कुछ लोग चाहते हैं। पाकिस्तान को भी कश्मीरी आतंकवादियों को समर्थन देना अब आसान नहीं लग रहा है।

उधर अमेरिका भारत से रिश्ते प्रगाढ़ बनाने में जुटा हुआ है। बावजूद इसके कि आतंकवाद से जंग में अमेरिका को पाकिस्तान की जरूरत है, लेकिन भारत को वह दीर्घकालिक दोस्त की नजर से देख रहा है। उसकी नजर चीन की बढ़ती ताकत और असर को कम करने पर है। उपमहाद्वीप में परमाणु हथियार आ जाने के बाद इसका सामरिक महत्व भी खासा बढ़ गया है। इसी बात को भारत और पाकिस्तान के परमाणु विस्फोटों के बाद प्रधानमंत्री अटलविहारी वाजपेयी ने महसूस किया था और 1998 में पाकिस्तान की तरफ दोस्ती का हाथ बढ़ाया था।

पाकिस्तान इस तर्क पर बना था कि दक्षिण एशिया के मुसलमानों को हिंदुओं के बहुमत वाले भारत से अलग अपना एक होमलैंड चाहिए। इस तर्क पर बने पाकिस्तान को हर तरह से भारत विरोधी होना ही था, शुरू से ही यह विरोध पाकिस्तान की राजनीति और विदेशनीति में है। सेना को ऐतिहासिक रूप से पाकिस्तान की इसी पहचान का संरक्षक बनाया गया है। दुनिया के किसी भी दूसरे देश की तरह पाकिस्तान का मकसद भी अपनी सुरक्षा को बनाए रखना और बढ़ाना है, खासतौर पर अपने से कई गुना ताकतवर पड़ोसी भारत के खिलाफ।

सुरक्षा के सवाल पर दोनों ही देश 1947 के बाद से लगातार परेशानी में रहे हैं। भारत के पास बहुत बड़ी अर्थव्यवस्था है, बहुत बड़ी सेना है और बहुत बड़ा भूगोल भी, इसके चलते पाकिस्तान ने भारत के प्रभाव को कम करने के लिए गैरपरंपरगत तरीके अपनाए। इसलिए उसने परमाणु हथियार को हासिल किया। फिर उसने आतंकवाद को विदेश नीति के औजार के रूप में इस्तेमाल किया, खासतौर पर जम्मू-कश्मीर में।

तमाम कोशिशें के बावजूद दोनों अपने मतभेद कभी नहीं खत्म कर सके। पाकिस्तानी फौज और खुफिया तंत्र का एक बहुत बड़ा तबका भारत के साथ टकराव को बनाए रखना चाहता है, क्योंकि जब तक यह टकराव बना रहेगा तब तक पाकिस्तानी समाज में उसका बोलबाला रहेगा। इस समय जब अमेरिका से सहयोग के कारण उसकी पाकिस्तान की इस्लामिक पहचान पर सवाल उठाए जा रहे हैं, भारत से टकराव को बढ़ाना उसकी मजबूरी बन गया है।

भारत पाकिस्तान की शांति प्रक्रिया बहुत कुछ इस पर भी निर्भर करती है कि पाकिस्तान का सियासी तंत्र भारत पर कहर ढाने वाले आतंकवादियों को किस हद तक नियंत्रित कर पाता है। और जब विभिन्न आतंकवादी समूह कश्मीर में जेहाद जारी रखने की घोषणा कर रहे हैं तो इस बात में संदेह है कि इस्लामाबाद का नागरिक प्रशासन उन पर ज्यादा नकेल कस सकेगा। पाकिस्तान ने आतंकवाद का जो दानव पैदा किया है, वह भारत-पाक शांति प्रयासों को यूं ही निगलता रहेगा। भारत के रक्षामंत्रालय की सालाना रिपोर्ट तो यह कहती हैं कि पाकिस्तान आतंकवादियों के ढांचे को तोड़ने के लिए कुछ नहीं कर रहा।

भारत-पाकिस्तान रिश्तों में सबसे बड़ी बाधा कश्मीर की ही बनी रहेगी। यह ऐसा मसला है, जिस पर भारत और पाकिस्तान अलग-अलग दिशा में जा रहे हैं। पाकिस्तान कश्मीर की यथास्थिति को बदलना चाहता है, जबकि भारत उसे बनाए रखना चाहता है। दोनों देशों के बीच चलने वाले किसी भी तरह के विश्वास बहाली के उपाय इसे बदल नहीं सकते। भारत यह मानकर चल रहा है कि शांति प्रक्रिया से पाकिस्तान को आतंकवादियों को समर्थन देना और उन्हें भारत भेजना बंद करने के लिए राजी कर लिया जाएगा और फिर दोनों अच्छे पड़ोसी देश के रूप में रहेंगे। जबकि पाकिस्तान यह चाहता है कि वह शांति प्रक्रिया से कश्मीर को हासिल करने में कुछ प्रगति करे। यह साफ है कि भारत कश्मीर घाटी को नहीं छोड़ने जा रहा है। इससे शांति वार्ता की उलझन और बढ़ जाती है। भारत के लिए यह स्पष्ट नहीं है कि अगर वह वार्ता के लिए जाएगा तो उसके पास पाकिस्तान को देने के लिए क्या होगा, और पाकिस्तान यह नहीं समझ पाता कि कश्मीर से कम वह किस पर राजी हो।

इस मसले पर सरहद के दोनों तरफ जनमत की सोच अलग-अलग है। पाकिस्तान में इस्लामी जेहादी ही नहीं, मुख्यधारा के राजनीतिक दल भी कश्मीर मसले पर इस्लामाबाद के नरम रवये पर नाराज हैं। भारत में कांग्रेस की सरकार पाकिस्तान को कोई भी रियायत देने की स्थिति में नहीं है क्योंकि इसका अर्थ होगा भारत के पूरे राजनैतिक तंत्र का कोपभाजन बनना। भारत में आमराय यही है कि पाकिस्तान से व्यापारिक रिश्ते भी बनाए जाने चाहिए और दोनों देशों के बीच बस सेवा भी चलनी चाहिए, लेकिन इसके आगे कोई नहीं जाना चाहता। क्योंकि ऐसी कोशिश का अर्थ होगा अगर एक और आतंकवादी हमला होता है तो आप ही जिम्मेदार ठहराए जाएंगे। और जब तक सरहद के पार से लगातार आतंकवादी आ रहे हैं, कश्मीर की सरहद को नरम बनाए जाने पर भी भारत में कोई राजी होने वाला नहीं। भारत में कुल जमा सोच यही है कि कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है और जिस दिन पाकिस्तान इसे मान्यता दे देगा, समस्या खत्म हो जाएगी।

जब तक ये हालात हैं भारत-पाकिस्तान शांति वार्ता विश्वास बहाली के छोटे-मोटे कदमों और क्रिकेट मैचों से आगे जाने वाली नहीं है। अमेरिका को भारत पाकिस्तान दोनों की ही जरूरत है, इसलिए वह चाहे तो एक भूमिका निभा सकता है, वह पाकिस्तान पर आंतरिक राजनैतिक और संस्थागत सुधारों के लिए दबाव बना सकता है। दक्षिण एशिया का भविष्य अब इसी पर निर्भर करेगा कि अमेरिका इसके लिए पाकिस्तान को कितना राजी कर पाता है।

harsh.pant@ kcl. ac. uk

लेखक किंग्स कॉलेज लंदन में प्राध्यापक हैं

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