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अपात्रता

इदं ते नातपस्काय नामक्ताय कदायन
न याशुश्रूषवे वाच्यं न च मां योsभ्यसूयति॥
‘तुझे यह गीतारूप रहस्यमय उपदेश किसी भी काल में न तो तप रहित मनुष्य से कहना चाहिए, न भक्ति रहित से और न बिना सुनने की इच्छा वाले से ही कहना चाहिए। जो मुझमें दोष दृष्टि रखता है, उससे तो कभी भी नहीं करना चाहिए।’

गीता के अट्ठारहवें अध्याय में अर्जुन से श्रीकृष्ण ने यही बातें कही हैं। उन्होंने रहस्य और ज्ञान को सुनने वाले की अपात्रता बताई है। यह अपात्रता मात्र गीता रहस्य सुनने के संदर्भ में नहीं है। सच बात तो यह है कि सब व्यक्तियों की रुचि, संस्कार और ग्राह्यता एक समान नहीं होती। इसलिए यदि हम अरुचि वाले व्यक्ति के सामने किसी क्षेत्र विशेष का ज्ञान रखते हैं तो हमारा वह परिश्रम व्यर्थ ही जाता है।

ग्रामीण भाषा में इसी नाकाम परिणाम के लिए कहा गया है -‘भैंस के आगे बीन बजाई, भैंस बैठी पगुराई।’अक्सर ज्ञान देने वाले भी अपात्र होते हैं। जो ज्ञान वे दूसरों को सुनाते हैं, उसे स्वयं व्यवहार में नहीं लाते। किसी भी ज्ञान को ग्रहण करने की अपात्रता पर भी ध्यान देना चाहिए। तप और भक्ित रहित व्यक्ति गीता ज्ञान के लिए अपात्र है।

दरअसल, तप और भक्ति से मन और मस्तिष्क का अनुशासन बनता है। अनुशासित मन से ही किसी भी ज्ञान को ग्रहण किया जा सकता है। सुनने की पात्रता की प्रथम शर्त उसके मन का अनुशासित होना है। दूसरी शर्त है सुनने की इच्छा रखना। वाचक के प्रति अनास्था रखने वालों को कभी अपना ज्ञान नहीं सुनाना चाहिए।

जीवन और व्यवहार में सुनने वाले की अपात्रता के इन सूत्रों को ध्यान में रखकर बेकार के परिश्रम से बचा जा सकता है। कई बार हम इसलिए परेशान हो उठते हैं कि किसी व्यक्ति को अपना अनुभव और ज्ञान सुना-सुनाकर थक जाते हैं, वह है कि सुनता ही नहीं। इसमें सिर्फ उसका दोष नहीं है। दोष सुनाने वाले का भी है।

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