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अराजकता की रेल

ट्रेनों में हिंसा की वजहें कितनी भी स्थानीय हों पर उसकी आंच अखिल भारतीय स्तर पर महसूस की जाती है। हालांकि बिहार के बिहटा रेलवे स्टेशन पर श्रमजीवी एक्सप्रेस के साथ मंगलवार को जो कुछ हुआ उसके लिए रेलमंत्री ममता बनर्जी ने छात्रों को जिम्मेदार न बताते हुए उसे रोजमर्रा की घटना कह कर टाल दिया है, पर वह गुस्सा पूरी तरह नाजयज  और निंदनीय था।

रेलवे की ऐसी घटनाएं देश के किसी कोने में रहने वाले रेलयात्री को डराती हैं। विशेषकर जब ऐसी घटना बिहार जैसे राज्य में हो, जिसकी अराजक छवि बड़ी मुश्किल से सुधर रही है और जहां से देश की लंबी दूरी की तमाम महत्वपूर्ण गाड़ियां गुजरती हैं। वैसे तो देश भर की रेलगाड़ियों में स्थानीयता और अखिल भारतीयता की एक खींचतान चलती रहती है, लेकिन यह स्थिति उत्तर भारत में कुछ ज्यादा ही है।

इस टकराव को दूर करने के लिए ही रेलवे ने दैनिक यात्रियों के लिए लोकल ट्रेनें चला रखी हैं। कई बार उनमें विलंब के चलते दैनिक यात्री लंबी दूरी की गाड़ियों पर भी काबिज हो जाते हैं। लेकिन स्थानीय जरूरत और दादागिरी का यह मामला तब चरम पर पहुंच जाता है, जब वह बिना टिकट ट्रेन में घुसने तक सीमित न रह कर, उच्च श्रेणी के यात्रियों को उनकी सीटों से उठा देने और अपमानित करने तक पहुंच जाता है।

ये हरकतें बेरोजगारों को नौकरी पाने जैसा और नौकरी पाए कर्मचारियों को प्रमोशन पाने जैसा सुख देती हैं। सुविधा और सत्ता का यह नाजयज सुख जब भंग होता है तो वे हिंसा पर उतारू होते हैं। निश्चित तौर पर यह अराजक मानसिकता है और यह महज रेलवे ही नहीं, हमारे लोकतंत्र के लिए भी घातक ही है। इसी अनुशासनहीन मानसिकता के तहत भारत की सड़कें दुनिया में दुर्घटनाओं का रिकार्ड बना रही हैं और यही रेलवे की परिसंपत्तियों को आग के हवाले करती हैं।

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