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कौन सुने फरियाद, भ्रष्टों की इस नगरी में

देश की आजादी की 63वीं वर्षगांठ के बाद ऐसा लगता है कि आजादी सही अर्थो में भ्रष्ट अधिकारियों और भ्रष्ट ठेकेदारों के लिए रह गई है। पालम रेलवे स्टेशन से रेल की पटरी के समानान्तर, दिल्ली कैन्ट की ओर चलने वाले रोड पर जनसुविधा की दृष्टि से सरकार करोड़ों की लागत से एक नाले का निर्माण करवा रही है। लेकिन आखिर में आकर नाले का निर्माण मात्र खानापूर्ति रह गया है। एक तरफ की दीवार पन्द्रह इंच तो दूसरी तरफ मात्र चार इंच। पीछे नाले की गहराई सात फुट तो आखिर में चलकर मात्र चार फुट। यानी लैबलिंग का कोई ध्यान नहीं, पानी नहीं निकल सकता। इसकी शिकायत मैंने पत्र द्वारा 4 अगस्त 2009 को मेयर, निगम आयुक्त तथा निगम उपायुक्त नजफगढ़ को तथा सूचना के अधिकार के तहत भी पूछा, लेकिन कोई नतीजा नहीं।
ए. एस. यादव, पालम, नई दिल्ली

भ्रष्टाचारी मस्त, जनता त्रस्त
झारखंड पुलिस ने अभी हाल में दुमका गांव के रामविलास नामक व्यक्ति को इतनी बुरी तरह से बांधकर पीटा कि देखकर रोंगटे खड़े जा जाएं। वह व्यक्ति मानसिक तौर पर बीमार था। उसके बावजूद केवल अपना रौब दर्शाने के लिए पुलिस ने उसके साथ ऐसा किया। जब एक मानसिक तौर पर कमजोर व्यक्ति के साथ ऐसा हो सकता है तो एक सामान्य व्यक्ति की क्या औकात? सब्जी का ठेला लगाने वाले से लेकर सड़क किनारे सोने वालों तक से पैसे लिए जाते हैं। यह पुलिस की कमाई का हिस्सा है। तब जाकर वह व्यक्ति परिवार का भरण-पोषण कर पाता है। फुटपाथ पर सोने वालों से भी इनका महीना बंधा होता है। पुलिस क्या भला करेगी? क्या रक्षा करेगी? किससे रक्षा करेगी?
रेनू यादव, नोएडा

महत्व गुरु नहीं, गुरुघंटाल का
आज के जमाने में गुरु बचे ही कहां हैं। अब तो गुरुघंटाल ही बचे हैं। एक जमाना था, जब गुरु को दार्शनिक, विचारक एवं समाज सुधारक के रूप में देखा जाता था। यहां तक कि उसे भगवान से भी बड़ा माना जाता था। लेकिन आज गुरु शब्द से एक ऐसे प्राणी का बोध होता है, जो स्कूलों में मात्र अकादमिक विषयों की शिक्षा देता फिरता है। गैर शैक्षणिक कार्यो का चार्ज भी इसी गुरु के पास रहता है। ‘रेडीमेड’ एवं ‘शार्टकट’ संस्कृति ने शिक्षा को भी अपनी चपेट में ले लिया है। अत: पासबुक, कुंजी एवं वन वीक सीरीजों का महत्व बढ़ता जा रहा है और गुरु का महत्व कम होता जा रहा है। मजेदार बात तो यह है कि गुरु को भी इन शार्टकट साधनों से पढ़ाते हुए पकड़ा जा सकता है। गुरु अब अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाने वाला एक सशक्त माध्यम नहीं रहा।
युधिष्ठिर लाल कक्कड़, गुड़गांव,

समाज को विकसित होना होगा
हम अक्सर फिल्मों में देखते हैं कि प्रेमी जोड़ों को काफी तकलीफें झेलनी पड़ती हैं, लेकिन अंतत: जीत उनके प्रेम की ही होती है, लेकिन असल जिन्दगी में ऐसा नहीं होता। पिछले कुछ दिनों में हरियाणा और पंजाब में प्रेम विवाह के पीछे हत्या की कई घटनाएं सामने आई हैं। गौर करने लायक है कि सरकार और कानून को प्रेम विवाह पर कोई आपत्ति नहीं है। सुप्रीम कोर्ट भी कह चुका है कि बालिग जोड़े अपनी मर्जी से विवाह कर सकते हैं। सवाल उठता है कि अपनी मर्जी का जीवन साथी चुनने पर मौत की सजा क्यों? हमें मानसिक तौर पर विकसित होना पड़ेगा, तभी हम आधुनिक व विकसित समाज बना पाएंगे।
पंकज गुप्ता, गाजियाबाद

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